: ऊँ 

 ब्राह्मण निर्धन होगा तो बनेगा

" सुदामा "

 फिर एक दिन "श्री कृष्ण" उसकी

सेवा करेंगे !

 

 ब्राह्मण अपमानित होगा तो बनेगा

" चाणक्य "

 फिर एक दिन नये राज्य कि

स्थापना कर देगा !

 

 ब्राह्मण सठिया जायेगा तो बनेगा

" परशुराम "

 फिर एकदिन पापियों का विनाश

कर देगा !

 

 ब्राह्मण पढ़ेगा तो बन जायेगा

" आर्यभट्ट "

 फिर एक दिन पुरे विश्व को

0 ( ZERO ) दे जायेगा !

 

 ब्राह्मण जब वेद धर्म का विनाश

देखेगा तो बन जायेगा 

" आदि शँकराचार्य "

 फिर एक दिन वैदिक धर्म कि

स्थापना कर देगा !

 

 ब्राह्मण जब लोगों को बीमार 

देखेगा तो बन जायेगा 

" चरक "

 फिर एक दिन पुरे विश्व को

आर्युवेद दे जायेगा !

 

 ब्राह्मण ने हमेशा अपने ज्ञानके

प्रकाश से विश्व को प्रकाशित किया !

 

सतसत प्रणाम है

ब्राह्मण समाज को ...............

 

कुछ बात है कि हस्ती

मिटती नही हमारी 

 

Dedicated 2 All Brahmans

 

 ब्राह्मण धर्म

 वेद

 

 ब्राह्मण कर्म

 गायत्री

 

 ब्राह्मण जीवन

 त्याग

 

 ब्राह्मण मित्र

 सुदामा

 

 ब्राह्मण क्रोध

 परशुराम

 

 ब्राह्मण त्याग

 ऋषि दधिची

 

 ब्राह्मण राज

 बाजीराव पेशवा

 

 ब्राह्मण प्रतिज्ञा

 चाणक्य

 

 ब्राह्मण बलिदान

 मंगल पाण्डेय 

चन्द्र शेखर आज़ाद

 

 ब्राह्मण भक्ति

 रावण

 

 ब्राह्मण ज्ञान

 आदि गुरु शंकराचार्य

 

 ब्राह्मण सुधारक

 महर्षि दयानंद

 

 ब्राह्मण राजनीतिज्ञ

 कोटिल्य

 

✨ ब्राह्मण विज्ञान

 

रसायन शास्त्र : धातु, आसव, तत्व - सब भारतीय सत्य

 

 

लेखक - सुरेश सोनी

 

सायन शास्त्र का सम्बन्ध धातु विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान से भी है। वर्तमान काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने ‘हिन्दू केमेस्ट्री‘ ग्रंथ लिखकर कुछ समय से लुप्त इस शास्त्र को फिर लोगों के सामने लाया। रसायन शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है। खनिजों, पौधों, कृषिधान्य आदि के द्वारा विविध वस्तुओं का उत्पादन, विभिन्न धातुओं का निर्माण व परस्पर परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि में आवश्यक औषधियों का निर्माण इसके द्वारा होता है।

 

पूर्व काल में अनेक रसायनज्ञ हुए, उनमें से कुछ की कृतियों निम्नानुसार हैं।

नागार्जुन-रसरत्नाकर, कक्षपुटतंत्र, आरोग्य मंजरी, योग सार, योगाष्टक

 

वाग्भट्ट - रसरत्न समुच्चय

गोविंदाचार्य - रसार्णव

यशोधर - रस प्रकाश सुधाकर

रामचन्द्र - रसेन्द्र चिंतामणि

सोमदेव- रसेन्द्र चूड़ामणि

 

रस रत्न समुच्चय ग्रंथ में मुख्य रस माने गए निम्न रसायनों का उल्लेख किया गया है-

 

(१) महारस (२) उपरस (३) सामान्यरस (४) रत्न (५) धातु (६) विष (७) क्षार (८) अम्ल (९) लवण (१०) लौहभस्म।

 

महारस (१) अभ्रं (२) वैक्रान्त (३) भाषिक (४) विमला (५) शिलाजतु (६) सास्यक (७)चपला (८) रसक

 

उपरस :- (१) गंधक (२) गैरिक (३) काशिस (४) सुवरि (५) लालक (६) मन: शिला (७) अंजन (८) कंकुष्ठ

 

सामान्य रस- (१) कोयिला (२) गौरीपाषाण (३) नवसार (४) वराटक (५) अग्निजार (६) लाजवर्त (७) गिरि सिंदूर (८) हिंगुल (९) मुर्दाड श्रंगकम्‌

 

इसी प्रकार दस से अधिक विष हैं।

अम्ल का भी वर्णन है। द्वावक अम्ल (च्दृथ्ध्ड्ढदद्य ठ्ठड़त्ड्ड) और सर्वद्रावक अम्ल (ठ्ठथ्थ्‌ ड्डत्द्मद्मदृथ्ध्त्दढ़ ठ्ठड़त्ड्ड)

 

विभिन्न प्रकार के क्षार का वर्णन इन ग्रंथों में मिलता है तथा विभिन्न धातुओं की भस्मों का वर्णन आता है।

 

प्रयोगशाला- ‘रस-रत्न-समुच्चय‘ अध्याय ७ में रसशाला यानी प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन भी है। इसमें ३२ से अधिक यंत्रों का उपयोग किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं- (१) दोल यंत्र (२) स्वेदनी यंत्र (३) पाटन यंत्र (४) अधस्पदन यंत्र (५) ढेकी यंत्र (६) बालुक यंत्र (७) तिर्यक्‌ पाटन यंत्र (८) विद्याधर यंत्र (९) धूप यंत्र (१०) कोष्ठि यंत्र (११) कच्छप यंत्र (१२) डमरू यंत्र।

 

प्रयोगशाला में नागार्जुन ने पारे पर बहुत प्रयोग किए। विस्तार से उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके औषधीय प्रयोग की विधियां बताई हैं। अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं का मिश्रण तैयार करने, पारा तथा अन्य धातुओं का शोधन करने, महारसों का शोधन तथा विभिन्न धातुओं को स्वर्ण या रजत में परिवर्तित करने की विधि दी है।

 

पारे के प्रयोग से न केवल धातु परिवर्तन किया जाता था अपितु शरीर को निरोगी बनाने और दीर्घायुष्य के लिए उसका प्रयोग होता था। भारत में पारद आश्रित रसविद्या अपने पूर्ण विकसित रूप में स्त्री-पुरुष प्रतीकवाद से जुड़ी है। पारे को शिव तत्व तथा गन्धक को पार्वती तत्व माना गया और इन दोनों के हिंगुल के साथ जुड़ने पर जो द्रव्य उत्पन्न हुआ, उसे रससिन्दूर कहा गया, जो आयुष्य-वर्धक सार के रूप में माना गया।

 

पारे की रूपान्तरण प्रक्रिया-इन ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि रस-शास्त्री धातुओं और खनिजों के हानिकारक गुणों को दूर कर, उनका आन्तरिक उपयोग करने हेतु तथा उन्हें पूर्णत: योग्य बनाने हेतु विविध शुद्धिकरण की प्रक्रियाएं करते थे। उसमें पारे को अठारह संस्कार यानी शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। इन प्रक्रियाओं में औषधि गुणयुक्त वनस्पतियों के रस और काषाय के साथ पारे का घर्षण करना और गन्धक, अभ्रक तथा कुछ क्षार पदार्थों के साथ पारे का संयोजन करना प्रमुख है। रसवादी यह मानते हैं कि क्रमश: सत्रह शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद पारे में रूपान्तरण (स्वर्ण या रजत के रूप में) की सभी शक्तियों का परीक्षण करना चाहिए। यदि परीक्षण में ठीक निकले तो उसको अठारहवीं शुद्धिकरण की प्रक्रिया में लगाना चाहिए। इसके द्वारा पारे में कायाकल्प की योग्यता आ जाती है।

 

धातुओं को मारना:- विविध धातुओं को उपयोग करने हेतु उसे मारने की विधि का वर्णन किया गया है। प्रयोगशाला में धातुओं को मारना एक परिचित विधि थी। गंधक का सभी धातुओं को मारने में उपयोग होता था। अत: ग्रंथ में गंधक की तुलना सिंह से की गई तथा धातुओं की हाथी से और कहा गया कि जैसे सिंह हाथी को मारता है उसी प्रकार गंधक सब धातुओं को मारता है।

 

जस्ते का स्वर्ण रंग में बदलना-हम जानते हैं जस्ता (झ्त्दत्त्‌) शुल्व (तांबे) से तीन बार मिलाकर गरम किया जाए तो पीतल (एद्धठ्ठद्मद्म) धातु बनती है, जो सुनहरी मिश्रधातु है। नागार्जुन कहते हैं-

 

क्रमेण कृत्वाम्बुधरेण रंजित:।

करोति शुल्वं त्रिपुटेन काञ्चनम्‌॥

(रसरत्नाकार-३)

 

धातुओं की जंगरोधी क्षमता-गोविन्दाचार्य ने धातुओं के जंगरोधन या क्षरण रोधी क्षमता का क्रम से वर्णन किया है। आज भी वही क्रम माना जाता है।

 

सुवर्ण रजतं ताम्रं तीक्ष्णवंग भुजङ्गमा:।

लोहकं षडि्वधं तच्च यथापूर्व तदक्षयम्‌॥

(रसार्णव-७-८९-१०)

 

अर्थात्‌ धातुओं के अक्षय रहने का क्रम निम्न प्रकार से है- सुवर्ण, चांदी, ताम्र, वंग, सीसा, तथा लोहा। इसमें सोना सबसे ज्यादा अक्षय है।

 

तांबे से मथुर तुप्ता

(ड़दृद्रद्रड्ढद्ध द्मद्वथ्द्रण्ठ्ठद्यड्ढ) बनाना-

ताम्रदाह जलैर्योगे जायते

तुत्यकं शुभम्‌।

 

अर्थात्‌ तांबे के साथ तेजाब का मिश्रण होता है तो कॉपर सल्फेट प्राप्त होता है।

 

भस्म:- रासायनिक क्रिया द्वारा धातु के हानिकारक गुण दूर कर उन्हें राख में बदलने पर उस धातु की राख को भस्म कहा जाता है। इस प्रकार मुख्य रूप से औषधि में लौह भस्म (क्ष्द्धदृद), सुवर्ण भस्म (क्रदृथ्ड्ड), रजत भस्म (च्त्थ्ध्ड्ढद्ध), ताम्र भस्म (क्दृद्रद्रड्ढद्ध), वंग भस्म (च्र्त्द), सीस भस्म (ख्र्ड्ढठ्ठड्ड) प्रयोग होता है।

 

वज्रसंधात (ॠड्डठ्ठथ्र्ठ्ठदद्यत्दड्ढ क्दृथ्र्द्रदृद्वदड्ड)-वराहमिहिर अपनी बृहत्‌ संहिता में कहते हैं-

अष्टो सीसक भागा: कांसस्य द्वौ तु रीतिकाभाग:।

मया कथितो योगोऽयं विज्ञेयो वज्रसड्घात:॥

 

अर्थात्‌ एक यौगिक जिसमें आठ भाग शीशा, दो भाग कांसा और एक भाग लोहा हो उसे मय द्वारा बताई विधि का प्रयोग करने पर वह वज्रसङ्घात बन जाएगा।

आसव बनाना-

 

चरक के अनुसार ९ प्रकार के आसव बनाने का उल्लेख है।

 

१. धान्यासव - ङदृदृद्यद्म

२. फलासव-क़द्धद्वत्द्यद्म

३. मूलासव-क्रद्धठ्ठत्दद्म ठ्ठदड्ड द्मड्ढड्ढड्डद्म

४. सरासव-ज़्दृदृड्ड

५. पुष्पासव-क़थ्दृध्र्ड्ढद्धद्म

६. पत्रासव-थ्ड्ढठ्ठध्ड्ढद्म

७. काण्डासव-द्मद्यड्ढथ्र्द्म (च्द्यठ्ठड़त्त्द्म)

८. त्वगासव-एठ्ठद्धत्त्द्म

९. शर्करासव-च्द्वढ़ड्ढद्ध

 

इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के गंध, इत्र सुगंधि के सामान आदि का भी विकास हुआ था।

 

ये सारे प्रयोग मात्र गुरु से सुनकर या शास्त्र पढ़कर नहीं किए गए। ये तो स्वयं प्रत्यक्ष प्रयोग करके सिद्ध करने के बाद कहे गए हैं। इसकी अभिव्यक्ति करते हुए अनुमानत: १३वीं सदी के रूद्रयामल तंत्र के एक भाग रस कल्प में रस शास्त्री कहता है।

 

इति सम्पादितो मार्गो द्रुतीनां पातने स्फुट:

साक्षादनुभवैर्दृष्टों न श्रुतो गुरुदर्शित:

लोकानामुपकाराएतत्‌ सर्वें निवेदितम्‌

सर्वेषां चैव लोहानां द्रावणं परिकीर्तितम्‌-

(रसकल्प अ.३)

 

अर्थात्‌ गुरुवचन सुनकर या किसी शास्त्र को पढ़कर नहीं अपितु अपने हाथ से इन रासायनिक प्रयोगों और क्रियाओं को सिद्धकर मैंने लोक हितार्थ सबके सामने रखा है।

 

प्राचीन रसायन शास्त्रियों की प्रयोगशीलता का यह एक प्रेरणादायी उदाहरण है।

 

धातु विज्ञान का चमत्कार

 

लेखक - सुरेश सोनी

 

धातु विज्ञान का भारत में प्राचीन काल से व्यावहारिक जीवन में उपयोग होता रहा है। यजुर्वेद के एक मंत्र में निम्न उल्लेख आया है-

 

अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च में पर्वताश्च में सिकताश्च में वनस्पतयश्च मे हिरण्यं च मेऽयश्च में श्यामं च मे लोहं च मे सीस च में त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्‌ (कृ.यजु. ४-७-५)

 

मेरे पत्थर, मिट्टी, पर्वत, गिरि, बालू, वनस्पति, सुवर्ण, लोहा लाल लोहा, ताम्र, सीसा और टीन यज्ञ से बढ़ें।

 

रामायण, महाभारत, पुराणों, श्रुति ग्रंथों में भी सोना (सुवर्ण, हिरण्य), लोहा (स्याम), टिन (त्रपु), चांदी (रजत), सीसा, तांबा, (ताम्र), कांसा आदि का उल्लेख आता है। 

 

धातु विज्ञान से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले कुछ लोगों के नाम-

कर्मरा- कच्ची धातु गलाने वाले

धमत्र - भट्टी में अग्नि तीव्र करने वाले

हिरण्यक - स्वर्ण गलाने वाले

खनक - खुदाई कर धातु निकालने वाले। 

 

चरक, सुश्रुत, नागार्जुन ने स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह, अभ्रक, पारा आदि से औषधियां बनाने की विधि का विस्तार से अपने ग्रंथों में वर्णन किया है। केवल प्राचीन ग्रंथों में ही विकसित धातु विज्ञान का उल्लेख नहीं मिलता, अपितु उसके अनेक प्रमाण आज भी उपलब्ध होते हैं। कुछ उदाहरण-

 

(१) जस्ता- (झ्त्दड़) धातु विज्ञान के क्षेत्र में जस्ते की खोज एक आश्चर्य है। आसवन प्रक्रिया (क़्त्द्मद्यत्थ्ठ्ठद्यत्दृद द्रद्धदृड़ड्ढद्मद्म) के द्वारा कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता निकालने की प्रक्रिया निश्चय ही भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। राजस्थान के ‘जवर‘ क्षेत्र में खुदाई के दौरान ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में इसके निर्माण की प्रक्रिया के अवशेष मिले हैं। मात्र दस फीसदी जस्ते से पीतल सोने की तरह चमकने लगता है। जवर क्षेत्र की खुदाई में जो पीतल की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उनका रासायनिक विश्लेषण करने पर पाया गया कि इनमें जस्ते की मात्रा ३४ प्रतिशत से अधिक है, जबकि आज की ज्ञात विधियों के अनुसार सामान्य स्थिति में पीतल में २८ प्रतिशत से अधिक जस्ते का सम्मिश्रण नहीं हो पाता है।

 

जस्ते को पिघलाना भी एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि सामान्य दबाव में यह ९१३०से. तापक्रम पर उबलने लगता है। जस्ते के आक्साइड या कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता प्राप्त करने के लिए उसे १२०००से. तापक्रम आवश्यक है, लेकिन इतने तापक्रम पर जस्ता भाप बन जाता है। अत: उस समय पहले जस्ते का आक्साइट बनाने के लिए कच्चे जस्ते को भूंजते थे, फिर भुंजे जस्ते को कोयला व अपेक्षित प्रमाण में नमक मिलाकर मिट्टी के मटकों में तपाया जाता था तथा ताप १२०००से पर बनाए रखा जाता था। इस पर वह भाप बन जाता था, परन्तु भारतीयों ने उस समय विपरीत आसवनी नामक प्रक्रिया विकसित की थी। इसके प्रमाण जवर की खुदाई में मिले हैं। इसमें कार्बन मोनोआक्साइड के वातावरण में जस्ते के आक्साइड भरे पात्रों को उल्टे रखकर गर्म किया जाता था। जैसे ही जस्ता भाप बनता, ठीक नीचे रखे ठंडे स्थान पर पहुंच कर धातु रूप में आ जाता था और इस प्रकार शुद्ध जस्ते की प्राप्ति हो जाती थी। जस्ते को प्राप्त करने की यह विद्या भारत में ईसा के जन्म से पूर्व से प्रचलित रही।

 

यूरोप के लोग १७३५ तक यह मानते थे कि जस्ता एक तत्व के रूप में अलग से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यूरोप में सर्वप्रथम विलियम चैम्पियन ने जस्ता प्राप्त करने की विधि व्रिस्टल विधि के नाम से पेटेंट करवाई और यह नकल उसने भारत से की, क्योंकि तेरहवीं सदी के ग्रंथ रसरत्नसमुच्चय में जस्ता बनाने की जो विधि दी है, व्रिस्टल विधि उसी प्रकार की है। 

 

(२) लोहा- (क्ष्द्धदृद) इतिहास में भारतीय इस्पात की श्रेष्ठता के अनेक उल्लेख मिलते हैं। अरब और फारस में लोग भारतीय इस्पात की तलवार के लिए लालायित रहते थे। अंग्रेजों ने सर्वाधिक कार्बन युक्त इस्पात को बुट्ज नाम दिया। प्रसिद्ध धातु वैज्ञानिक तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. अनंतरमन ने इस्पात बनाने की सम्पूर्ण विधि बताई है। कच्चे लोहे, लकड़ी तथा कार्बन को मिट्टी की प्यालियों में १५३५०से. ताप पर गर्म कर धीरे-धीरे २४ घण्टे में ठण्डा करने पर उच्च कार्बन युक्त इस्पात प्राप्त होता है। इस इस्पात से बनी तलवार इतनी तेज तथा मजबूत होती है कि रेशम को भी सफाई से काट देती है।

 

१८वीं सदी में यूरोपीय धातु विज्ञानियों ने भारतीय इस्पात बनाने का प्रयत्न किया, परन्तु असफल रहे। माइकेल फैराडे ने भी प्रयत्न किया, पर असफल रहा। कुछ ने बनाया तो उसमें वह गुणवत्ता नहीं थी।

 

श्री धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तक क्ष्दड्डत्ठ्ठद द्मड़त्ड्ढदड़ड्ढ ठ्ठदड्ड द्यड्ढड़ण्ददृथ्दृढ़न्र्‌ त्द द्यण्ड्ढ ड्ढत्ढ़ण्द्यड्ढड्ढदद्यण्‌ ड़ड्ढदद्यद्वद्धन्र्‌ में यूरोपीय लोगों ने जो प्रगत लौह उद्योग के प्रमाण दिए हैं, उनका उल्लेख किया है। सितम्बर, १७१५ को डा. बेंजामिन हायन ने जो रपट ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भेजी, उसमें वह उल्लेख करता है कि रामनाथ पेठ (तत्कालीन मद्रास प्रान्त में बसा) एक सुन्दर गांव है। यहां आस-पास खदानें हैं तथा ४० इस्पात की भट्टियां हैं। इन भट्टियों में इस्पात निर्माण के बाद उसकी कीमत २ रु. मन पड़ती है। अत: कम्पनी को इस दिशा में सोचना चाहिए।

 

दूसरी रपट मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन की है जिसमें वह सेंट्रल इंडिया में इस्पात निर्माण के बारे में लिखता है। इसमें वह जबलपुर, पन्ना, सागर आदि स्थानों की लौह खदानों का वर्णन करता है तथा इस्पात बनाने की प्रक्रिया के बारे में वह कहता है चारकोल सारे हिन्दुस्तान में लोहा बनाने के काम में प्रयुक्त होता है। जिस भट्टी (क़द्वद्धदठ्ठड़ड्ढ) का उल्लेख करता है, उसका निर्माण किया गया है। उसमें सभी भाग बराबर औसत १९-२० क्द्वडत्द्य (क्द्वडत्द्य-लम्बाई मापने की प्राचीन इकाई, लगभग १८ इंच इसका माप था) के थे। और १६ छोटी क्द्वडत्द्य के थे। वह इस फर्नेस को बनाने की विधि का वर्णन करता है। फर्नेस बनाने पर उसके आकार को वह नापता है तो पूरी भट्टी में वह पाता है कि एक ही प्रकार की नाप है। लम्बाई सवा ४ भाग तो चौड़ाई ३ भाग होगी और मोटाई डेढ़ भाग। आगे वह लिखता है (१) गुडारिया (२) पचर (३) गरेरी तथा (४) अकरिया-ये उपांग इसमें लगाए जाते हैं। बाद में जब भट्टी पूरी तरह सूख जाती है तो उसे काम में लाया जाता है। भट्टी के बाद धोंकनी (एथ्दृध्र्‌) उसका मुंह (ग़्दृन्न्न्न्थ्ड्ढ) बनाने की विधि, उसके बाद भट्टी से जो कच्चा लोहा निकलेगा उसे शुद्ध करने की रिफायनरी का वर्णन करता है। फिर उससे इस्पात बनाने की प्रक्रिया तथा मात्रा का निरीक्षण उसने ३० अप्रैल, १८२७ से लेकर ६ जून, १८२७ तक किया। इस बीच ४ फरनेस से २२३५ मन इस्पात बना और इसकी विशेषता गुणवत्ता तथा विभिन्न तापमान एवं परिस्थिति में श्रेष्ठता की वह मुक्तकंठ से प्रशंसा करता है। उस समय एक मन की कीमत पौने बारह आना थी। सवा ३१ मन उ १ इंग्लिश टन।

 

मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन सागरमिंट के कप्तान प्रेसग्रेव का हवाला देते हुए कहता है कि भारत का सरिया (लोहा) श्रेष्ठ स्तर का है। उस स्वीडन के लोहे को भी वह मात देता है जो यूरोप में उस समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

 

तीसरी रपट कैप्टन डे. कैम्पबेल की है जो १८४२ की है। इसमें दक्षिण भारत में लोहे के निर्माण का वर्णन है। ये सब रपट कहती हैं कि उस समय देश में हजारों छोटी-छोटी इस्पात निर्माण की भट्टियां थीं। एक भट्टी में ९ लोगों को रोजगार मिलता था तथा उत्कृष्ट प्रकार का सस्ता लोहा बनता था। वैसा दुनिया में अन्य किसी देश में संभव नहीं था। कैम्पबेल ने रेलगाड़ी में लगाने के लिए बार आयरन की खोज करते समय बार-बार कहा, यहां का (भारत का) बार आरयन उत्कृष्ट है, सस्ता है। इंग्लैण्ड का बढ़िया लोहा भी भारत के घटिया लोहे का मुकाबला नहीं कर सकता। उस समय ९० हजार लोग इन भट्टियों में काम करते थे। अंग्रेजों ने १८७४ में बंगाल आयरन कंपनी की स्थापना कर बड़े पैमाने पर उत्पादन चालू किया। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे गांव-गांव में बनने वाले इस्पात की खपत कम होती गई और उन्नीसवीं सदी के अन्त तक स्वदेशी इस्पात बनना लगभग बंद हो गया। अंग्रेजों ने बड़े कारखाने लगाकर स्वदेशी प्रौद्योगिकी की कमर तोड़ दी। इसका दु:खद पक्ष यह है कि भारतीय धातु प्रौद्योगिकी लगभग लुप्त हो गई। आज झारखंड के कुछ वनवासी परिवारों में इस तकनीक के नमूने मात्र रह गए हैं। 

 

दिल्ली स्थित लौह स्तंभ एक चमत्कार

नई दिल्ली में कुतुबमीनार के पास लौह स्तंभ विश्व के धातु विज्ञानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। लगभग १६००० से अधिक वर्षों से यह खुले आसमान के नीचे सदियों से सभी मौसमों में अविचल खड़ा है। इतने वर्षों में आज तक उसमें जंग नहीं लगी, यह बात दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है। जहां तक इस स्तंभ के इतिहास का प्रश्न है, यह चौथी सदी में बना था। इस स्तम्भ पर संस्कृत में जो खुदा हुआ है, उसके अनुसार इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। चन्द्रराज द्वारा मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। इस पर गरुड़ स्थापित करने हेतु इसे बनाया गया होगा, अत: इसे गरुड़ स्तंभ भी कहते हैं। १०५० में यह स्तंभ दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल द्वारा लाया गया।

इस स्तंभ की ऊंचाई ७३५.५ से.मी. है। इसमें से ५० सेमी. नीचे है। ४५ से.मी. चारों ओर पत्थर का प्लेटफार्म है। इस स्तंभ का घेरा ४१.६ से.मी. नीचे है तथा ३०.४ से.मी. ऊपर है। इसके ऊपर गरुड़ की मूर्ति पहले कभी होगी। स्तंभ का कुल वजन ६०९६ कि.ग्रा. है। १९६१ में इसके रासायनिक परीक्षण से पता लगा कि यह स्तंभ आश्चर्यजनक रूप से शुद्ध इस्पात का बना है तथा आज के इस्पात की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा काफी कम है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुख्य रसायन शास्त्री डा. बी.बी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के २०-३० किलो को टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है। माना जाता है कि १२० कारीगरों ने पन्द्रह दिनों के परिश्रम के बाद इस स्तम्भ का निर्माण किया। आज से सोलह सौ वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की उक्त तकनीक भी आश्चर्य का विषय है, क्योंकि पूरे लौह स्तम्भ में एक भी जोड़ कहीं भी दिखाई नहीं देता। सोलह शताब्दियों से खुले में रहने के बाद भी उसके वैसे के वैसे बने रहने (जंग न लगने) की स्थिति ने विशेषज्ञों को चकित किया है। इसमें फास्फोरस की अधिक मात्रा व सल्फर तथा मैंगनीज कम मात्रा में है। स्लग की अधिक मात्रा अकेले तथा सामूहिक रूप से जंग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देते हैं। इसके अतिरिक्त ५० से ६०० माइक्रोन मोटी (एक माइक्रोन याने १ मि.मी. का एक हजारवां हिस्सा) आक्साइड की परत भी स्तंभ को जंग से बचाती है। 

 

(३) पारा (ग्ड्ढद्धड़द्वद्धद्धन्र्‌) यूरोप में १७वीं सदी तक पारा क्या है, यह वे जानते नहीं थे। अत: फ्र्ांस सरकार के दस्तावेजों में इसे दूसरी तरह की चांदी ‘क्विक सिल्वर‘ कहा गया, क्योंकि यह चमकदार तथा इधर-उधर घूमने वाला होता है। वहां की सरकार ने यह कानून भी बनाया था कि भारत से आने वाली जिन औषधियों में पारे का उपयोग होता है उनका उपयोग विशेषज्ञ चिकित्सक ही करें।

भारतवर्ष में लोग हजारों वर्षों से पारे को जानते ही नहीं थे अपितु इसका उपयोग औषधि विज्ञान में बड़े पैमाने पर होता था। विदेशी लेखकों में सर्वप्रथम अलबरूनी ने, जो ११वीं सदी में भारत में लम्बे समय तक रहा, अपने ग्रंथ में पारे को बनाने और उपयोग की विधि को विस्तार से लिखकर दुनिया को परिचित कराया। पारे को शुद्ध कर उसे उपयोगी बनाने की विधि की आगे रसायनशास्त्र सम्बंधी विचार करते समय चर्चा करेंगे। परन्तु कहा जाता है कि सन्‌ १००० में हुए नागार्जुन पारे से सोना बनाना जानते थे। आश्चर्य की बात यह है कि स्वर्ण में परिवर्तन हेतु पारे को ही चुना, अन्य कोई धातु नहीं चुनी। आज का विज्ञान कहता है कि धातुओं का निर्माण उनके परमाणु में स्थित प्रोटॉन की संख्या के आधार पर होता है और यह आश्चर्य की बात कि पारे में ८० प्रोटॉन-इलेक्ट्रान तथा सोने में ७९ प्रोटॉन-इलेक्ट्रान होते हैं। 

 

(४) सोना-चांदी (क्रदृथ्ड्ड-च्त्थ्ध्ड्ढद्ध) ए.डेल्मर अपनी पुस्तक ॠ क्तत्द्मद्यदृद्धन्र्‌ दृढ घ्द्धड्ढड़त्दृद्वद्म ग्ड्ढद्यठ्ठथ्द्म-१९०२ ग़्ड्ढध्र्‌ ज्ञ्दृद्धत्त्‌ में उल्लेख करता है कि सिन्धु नदी के उद्गम स्थल पर दो त्द्मथ्ठ्ठदड्ड हैं जिनका नाम ड़ण्द्धन्र्द्मड्ढ ठ्ठदड्ड ॠढ़न्र्द्धड्ढ है और जहां स्वर्ण और रजत के कण वहां की सारी मिट्टी में प्राप्त होते हैं।

ऋग्वेद के छठे मंडल के ६१वें सूक्त का सातवां मंत्र सरस्वती और सिन्धु को हिरण्यवर्तनी कहता है।

 

रामायण, महाभारत, श्रीमद्‌ भागवद्‌, रघुवंश, कुमारसंभव आदि ग्रंथों में सोने व चांदी का उल्लेख मिलता है। स्वर्ण की भस्म बनाकर उसके औषधीय उपयोग की परम्परा शताब्दियों से भारत में प्रचलित रही है।

 

इसी प्रकार सोने, तांबे (क्दृद्रद्रड्ढद्ध) तथा शीशे (ख्र्ड्ढठ्ठड्ड) के उपयोग के संदर्भ-अथर्ववेद, रसतरंगिणी, रसायनसार, शुक्रनीति, आश्वालायन गृह्यसूत्र, मनु स्मृति में मिलते हैं। रसरत्न समुच्चय ग्रंथ में अनेक धातुओं को भस्म में बदलने की विधि तथा उनका रोगों के निदान में उपयोग विस्तार के साथ लिखा गया है। इससे ज्ञान होता है कि धातु विज्ञान भारत में प्राचीन काल से विकसित रहा और इसका मानव कल्याण के लिए उपयोग करने के लिए विचित्र विधियां भारत में विकसित की गएं। 

 

केरल का धातु दर्पण

डा. मुरली मनोहर जोशी केरल में पत्तनम तिट्टा जिले में आरनमुड़ा नामक स्थान पर गए तो वहां उन्होंने पाया कि वहां के परिवारों में हाथ से धातु के दर्पण बनाने की तकनीक है। इन हाथ के बने धातु दर्पणों को जब उन्होंने विज्ञान समिति के अपने मित्रों को दिखाया तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ये दर्पण मशीन से नहीं अपितु हाथ से बने हैं और सदियों से ये दर्पण भारत से निर्यात होते रहे हैं। हम कभी अपने छात्रों को यह नहीं बताते कि हमारे यहां ऐसी तकनीक है कि अभावों में जीकर भी परम्परागत कला लुप्त न हो जाए, इस भावना के कारण आज भी वे इसे छोड़ने को तैयार नहीं। देश को ऐसे लोगों की चिंता करना चाहिए।

प्राचीन भारत में रसायन की परंपरा - १

 

लेखक - ओम प्रभात अग्रवाल , सेवानिवृत्त अध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा)

 

भारत में रसायन शास्त्र की अति प्राचीन परंपरा रही है। पुरातन ग्रंथों में धातुओं, अयस्कों, उनकी खदानों, यौगिकों तथा मिश्र धातुओं की अद्भुत जानकारी उपलब्ध है। इन्हीं में रासायनिक क्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले सैकड़ों उपकरणों के भी विवरण मिलते हैं।

 

वस्तुत: किसी भी देश में किसी ज्ञान विशेष की परंपरा के उद्भव और विकास के अध्ययन के लिए विद्वानों को तीन प्रकार के प्रमाणों पर निर्भर करना पड़ता है-

 

१. वहां का प्राचीन साहित्य २. पारंपरिक ज्ञान-जो पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित बच जाता हो ३. पुरातात्विक प्रमाण। इस दृष्टि से भारत में रसायनशास्त्र के उद्भव काल के निर्धारण के लिए विशाल संस्कृत साहित्य को खंगालना ही उत्तम जान पड़ता है। उल्लेखनीय है कि भारत में किसी भी प्रकार के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोत के रूप में वेदों को माना जाता है। इनमें भी ऐसा समझा जाता है कि ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। अर्वाचीन काल में ईसा की अठारहवीं शताब्दी से नये-नये तत्वों की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। इसके पूर्व केवल सात धातुओं का ज्ञान मानवता को था। ये हैं-स्वर्ण, रजत, तांबा, लोहा, टिन, लेड (सीसा) और पारद। इन सभी धातुओं का उल्लेख प्राचीनतम संस्कृत साहित्य में उपलब्ध है, जिनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद भी सम्मिलित हैं। वेदों की प्राचीनता ईसा से हजारों वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है।

 

इस प्रकार वेदों में धातुओं के वर्णन के आधार पर हम भारत में रसायन शास्त्र का प्रारंभ ईसा से हजारों वर्ष पूर्व मान सकते हैं। उल्लेखनीय है कि उपनिषदों का रचना काल भी यजुर्वेद के आसपास ही माना जाता है जबकि छांदोग्य उपनिषद्‌ में धात्विक मिश्रणन का स्पष्ट वर्णन मिलता है। यदि हम इसे पर्याप्त न मानें और कहें कि केवल रसायन शास्त्र में प्रयुक्त प्रक्रमों एवं रासायनिक क्रियाओं के ज्ञान के समुचित प्रमाण के साथ ही हम रसायन शास्त्र का प्रारंभ मान सकते हैं, तो भी हमें ईसा के एक हजार वर्ष पूर्व के काल (ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी) पर तो सहमत होना ही पड़ेगा। यही वह काल था जब विश्व प्रसिद्ध चरक एवं सुश्रुत संहिताओं का प्रणयन हुआ, जिनमें औषधीय प्रयोगों के लिए पारद, जस्ता, तांबा आदि धातुओं एवं उनकी मिश्र धातुओं को शुद्ध रूप में प्राप्त करने तथा सहस्त्रों औषधियों के विरचन में व्यवहृत रासायनिक प्रक्रियाओं यथा-द्रवण, आसवन, उर्ध्वपातन आदि का विस्तृत एवं युक्तियुक्त वर्णन मिलता है। नि:संदेह इस प्रकार के ज्ञानार्जन का प्रारंभ तो निश्चित रूप से इसके बहुत पहले से ही हुआ होगा। उल्लेखनीय है कि इन कालजयी ग्रंथों के लेखन के पश्चात, यद्यपि इसी काल में (ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी) में कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र‘ की रचना की जिसमें धातु, अयस्कों, खनिजों एवं मिश्र धातुओं से संबंधित अत्यंत सटीक जानकारी तथा उनके खनन, विरचन, खानों के प्रबंधन तथा धातुकर्म की आश्चर्यजनक व्याख्या मिलती है। भारत में इस प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान का यह ग्रंथ प्राचीनतम उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रथम सहस्राब्दी की दूसरी शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक तो ऐसी पुस्तकों की भरमार देखने को मिलती है जो शुद्ध रूप से केवल रसायन शास्त्र पर आधारित हैं और जिनमें रासायनिक क्रियाओं, प्रक्रियाओं का सांगोपांग वर्णन है। इनमें खनिज, अयस्क, धातुकर्म, मिश्र धातु विरचन, उत्प्रेरक, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक रसायन तथा उनमें काम आने वाले सैकड़ों उपकरणों आदि का अत्यंत गंभीर विवरण प्राप्त होता है।

 

‘भारतीय बौद्धिक संपदा‘ के फरवरी, २००० के अंक में १९४० में प्रकाशित एक मराठी पुस्तक ‘रसमंजरी‘ (लेखक- टी.जी.काले) के हवाले से ऐसी १२७ पुस्तकों की सूची प्रकाशित है। स्मरणीय है कि इस सूची में चरक एवं सुश्रुत संहिताएं सम्मिलित नहीं हैं। इन पुस्तकों में वर्णित अनेक तथ्य एवं प्रक्रियाएं अब आधुनिक रसायन शास्त्र के मानदंडों पर भी खरी उतरने लगी हैं।

 

सर्वप्रथम द्वितीय शताब्दी में नागार्जुन द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रस रत्नाकार‘ को लें। ऐसा विश्वास किया जाता है कि छठी शताब्दी में जन्मे इसी नाम के एक बौद्ध रसायनज्ञ ने इस पुस्तक का पुनरावलोकन किया। इसीलिए यह पुस्तक दो रूपों में उपलब्ध है। कुछ भी हो, यह पुस्तक अपने में रसायन का तत्कालीन अथाह ज्ञान समेटे हुए हैं। छठी शताब्दी में ही वराहमिहिर ने अपनी ‘वृहत्‌ संहिता‘ में अस्त्र-शस्त्रों को बनाने के लिए अत्यंत उच्च कोटि के इस्पात के निर्माण की विधि का वर्णन किया है। भारतीय इस्पात की गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि उनसे बनी तलवारों के फारस आदि देशों तक निर्यात किये जाने के ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं।

 

सर्वाधिक पुस्तकें आठवीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी के मध्य लिखी गएं। इनमें से प्रमुख हैं-वाग्भट्ट की अष्टांग हृदय, गोविंद भगवत्पाद की रस हृदयतंत्र एवं रसार्णव, सोमदेव की रसार्णवकल्प एवं रसेंद्र चूणामणि तथा गोपालभट्ट की रसेंद्रसार संग्रह। कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं-रसकल्प, रसरत्नसमुच्चय, रसजलनिधि, रसप्रकाश सुधाकर, रसेंद्रकल्पद्रुम, रसप्रदीप तथा रसमंगल आदि।

 

भारत में रसायन की समृद्धशाली प्राचीन परंपरा के पुरातात्विक प्रमाण भी समस्त देशों में बिखरे पड़े हैं। पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त धातु आदि के नमूनों के रासायनिक विश्लेषण से जहां उनकी उच्च गुणवत्ता का परिचय मिलता है, वहीं अनेक पदार्थों की कार्बन डेटिंग से प्राचीनता भी अकाट्य रूप से स्थापित होती है। उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम, सभी दिशाओं में ईसा पूर्व ३००० वर्ष से ३०० वर्ष ईसा पूर्व की अवधि में भी सक्रिय रही धातु की खदानों के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं। प्रमुखत: उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बंगाल, बिहार, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों में इनका पता चला है। उत्खनन से उजागर हुए नालंदा, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल एवं तक्षशिला आदि स्थलों से प्राप्त लोहा, तांबा, रजत, सीसा आदि धातुओं की शुद्धता ९५ से ९९ प्रतिशत तक पाई गई है। इन्हीं स्थलों से पीतल और कांसा, मिश्र धातुएं भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई है। इनकी शुद्धता इस बात की परिचायक है कि भारत में उच्चकोटि के धातुकर्म की प्राचीन परंपरा रही है। पुरातात्विक स्थलों से धातुकर्म में प्रयुक्त होने वाली जिन भट्ठियों आदि का पता चला है वे सभी संस्कृत पुस्तकों के विवरणों से मेल खाती है। हट्टी की स्वर्ण खदान में ६०० फुट की गहराई पर पाया गया उर्ध्वाधर शाफ्ट तकनीकी के क्षेत्र में भारतीय कौशल का जीता जागता उदाहरण है।

 

भारत की बहुत सी प्राचीन रसायन परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हुए आधुनिक समय तक जीवित हैं। आज भी हजारों वैद्य चरक द्वारा निर्देशित रीति से धातु आधारित एवं वानस्पतिक स्रोत वाली औषधियों का विरचन कर रहे हैं, जिनके दौरान अनेकानेक रासायनिक प्रक्रियाएं संपादित करनी पड़ती हैं। ईस्वी वर्ष १८०० में भी भारत में, व्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार, विभिन्न धातुओं को प्राप्त करने के लिए लगभग २०,००० भट्ठियां काम करती थीं जिनमें से दस हजार तो केवल लौह निर्माण भट्ठियां थीं और उनमें ८०,००० कर्मी कार्यरत थे। इस्पात उत्पाद की गुणवत्ता तत्कालीन अत्युत्तम समझे जाने वाले स्वीडन के इस्पात से भी अधिक थी। इसके गवाह रहे हैं सागर के तत्कालीन सिक्का निर्माण कारखाने के अंग्रेज प्रबंधक कैप्टन प्रेसग्रेन तथा एक अन्य अंग्रेज मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन। उसी समय तथा उसके काफी बाद तक लोहे के अतिरिक्त रसायन आधारित कई अन्य वस्तुएं यथा-साबुन, बारूद, नील, स्याही, गंधक, तांबा, जस्ता आदि भी भारतीय तकनीकी से तैयार की जा रही थीं। काफी बाद में अंग्रेजी शासन के दौरान पश्चिमी तकनीकी के आगमन के साथ भारतीय तकनीकी विस्मृत कर दी गई।

 

(क्रमश:)

प्राचीन भारत में रसायन की परम्परा - ३ : हमारे प्राचीन ज्ञान से समृद्ध होगा रसायन शास्त्र

 

 

डा. ओम प्रभात अग्रवाल

 

(सेवानिवृत्त अध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक हरियाणा)

 

 

 

इस श्रृंखला के दूसरे खंड में प्राचीन भारत के रसायनज्ञों के विभिन्न तत्वों के परमाणुओं के मध्य स्थापित हो जाने वाली रासायनिक बंधता के ज्ञान पर प्रकाश डाला गया। साथ ही, प्रायोगिक रसायन में काम आने वाले उपकरणों तथा उस काल में भारतीयों के धातुकर्म कौशल की भी चर्चा की गई। अब इस अंतिम खंड में तत्कालीन रसायनशास्त्र के शेष अन्य पक्षों पर विचार विमर्श करना समीचीन रहेगा।

 

रसार्णव नामक ग्रंथ में विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले तत्कालीन उत्प्रेरकों, रासायनिक अभिक्रियाओं को तीव्रता प्रदान करने वाले पदार्थ जिनमें से अधिकांश वानस्पतिक श्रोतों से प्राप्त किये जाते थे, का उल्लेख है। इसी ग्रंथ में कॉपर सल्फाइड, मैगनीज डाइऑक्साइड, कॉपर कार्बोनेट आदि यौगिकों के रंग, प्रकृति एवं उनके द्वारा दी जाने वाली लौ के वर्ण आदि की भी सटीक एवं आधुनिक ज्ञान के संगत जानकारी है। रस रत्नाकर में वनस्पतियों से कई प्रकार के अम्ल और क्षार की प्राप्ति की भी विधियां वर्णित हैं। 

 

पेड़-पौधों का रस

अधिकतर आयुर्वेद औषधियां वानस्पतिक श्रोतों अथवा धातुओं से विरचित होती है। इसके लिए चरक ने जहां पेड़-पौधों के रस प्राप्त करने के लिए उन्हें उबालने, आसवन एवं निक्षालन प्रक्रमों को विस्तार से बताया है, वहीं धातुओं की भस्मों (आक्साइड) अथवा माक्षिकों (सल्फाइड) आदि को तैयार करने की विधियों का भी सांगोपांग वर्णन किया है। अत्यंत रोचक बात तो यह है कि भिन्न-भिन्न क्रियाओं के लिए उपयुक्त भिन्न ताप उत्पन्न करने के लिए अलग-अलग वृक्षों की लकड़ियों के उपयोग का विधान किया गया है।

 

आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में गंधक का विशेष महत्व है। यह बहुधा प्रकृति में मुक्त अवस्था में उपलब्ध होता है। यद्यपि संयुक्त अवस्था में भी सल्फाइड एवं सल्फेट के रूप में इसके भंडार मिलते हैं। संस्कृत साहित्य में गंधक के तीन प्रकार बताए गए हैं। यद्यपि केवल एक पीला गंधक ही आज के रासायनिक ज्ञान में फिट बैठता है। विभिन्न श्रोतों से प्राप्त गंधक के शुद्धिकरण की जो प्रक्रिया रसार्णव में वर्णित है वह आज के फ्र्ाश एवं ली ब्लांश विधियों से काफी सीमा तक मिलती जुलती है। रसजलनिधि ग्रंथ में तो शुद्ध अवस्था में गंधक प्राप्त करने की चार विधियां बताई गई हैं।

 

धातुओं से शीघ्र संयुक्त हो जाने की प्रकृति के कारण ही गंधक को रसजलनिधि में शुल्वारि अथवा धातुओं का शत्रु कहा गया है। 

 

धातु मिश्रणन

प्राचीन भारतीय रसायनज्ञों को धातु मिश्रणन का भी ज्ञान था। यह छांदोग्य उपनिषद के इस कथन से सिद्ध होता है कि स्वर्ण जोड़ने के लिए सुहागा, चांदी के लिए स्वर्ण एवं वंग के लिए सीसा का प्रयोग किया जाना चाहिए।

 

प्राचीन भारत में रसायन के सिद्धांतों का ज्ञान इस सीमा तक था कि उन्हें वातावरण में नमी, ऑक्सीजन तथा अनेक अम्लीय अथवा क्षारीय पदार्थों के संपर्क में धातुओं के संक्षारण का तथ्य भी ज्ञात था। याज्ञवल्कय स्मृति में संक्षारित धातुओं को अम्ल अथवा क्षार की सहायता से शुद्ध करने का विधान भी दिया गया है। रसार्णव में यह भी बताया गया है कि वंग, सीसा, लोहा, तांबा, रजत और स्वर्ण में स्वत: संक्षारण की प्रवृत्ति इसी क्रम में घटती जाती है जो आधुनिक रसायनशास्त्र के संगत है।

 

संक्षारण एवं अन्य प्राकृतिक आक्रमणों से वस्तुओं को दस हजार वर्षों तक सुरक्षित रखने के लिए वराहमिहिर की वृहत संहिता में वज्र लेप एवं वज्र संघट्ट के प्रयोग की अनुशंसा है। वज्र लेप को वानस्पतिक एवं वज्र संघट्ट को जैविक श्रोतों से निर्मित करने की विधियां भी वर्णन की गई हैं। शुक्र नीति में कोयला, गंधक, शोरा, लाल आर्सेनिक, पीत आर्सेनिक, आक्सीकृत सीसा, सिंदूर, इस्पात का चूरा, कपूर, लाख, तारपीन एवं गोंद के भिन्न-भिन्न अनुपातों में मिश्रण को गर्म कर अनेक प्रकार के विस्फोटकों के निर्माण की चर्चा की गई है।

 

प्राचीन भारतीय रसायन साहित्य में सर्वाधिक समृद्ध अध्याय मिश्र धातुओं का है। पुरातात्विक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि ईसाई युग के प्रारंभ के सहस्रों वर्ष पहले से भारतीयों को मिश्र धातुओं और उनके महत्व का ज्ञान था। व्रोंज एवं पीतल के नमूने लगभग सभी उत्खनन स्थलों से प्राप्त हुए हैं और वेदों में भी इनका उल्लेख मिलता है। संस्कृत में तो जस्त का एक नाम सुवर्णकार इसीलिए है क्योंकि उसका संयोग तांबे को स्वर्ण समान धातु (पीतल) में परिवर्तित कर देता है। वस्तुत: वेदों में तथा रसार्णव, अर्थशास्त्र, अष्टाध्यायी एवं रसरत्न समुच्चय आदि ग्रंथों में पीतल को भी सुवर्ण कहकर ही पुकारा गया है।

 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चार प्रकार की सिक्का धातुएं वर्णित हैं-मशकम, अर्धमशकम, काकनी एवं अर्धकाकनी। ये सभी रजत, तांबा, लोहा, वंग और सीसा अथवा एंटिमनी को विभिन्न अनुपातों में मिलाकर बनाई जाती थीं। इसी प्रकार चांदी एवं पारद की भी कई वर्णों वाली मिश्र धातुएं बनाई जाती थीं। वंग की भी सोने के वर्ण वाली कई मिश्र धातुएं अभ्रक, तांबा, चांदी और पारे के संयोग से विरचित की जाती थीं। स्वर्ण की तो अनेक मिश्र धातुएं ज्ञात थीं।

 

स्वर्ण जैसे रंग वाली पीतल धातु तांबे और जस्त के मुख्यत: दो प्रकार के अनुपातों से बनाई जाती थीं और इनके नाम रीतिका एवं काकतुंडी थे। जस्त का मिश्रणन सीधे ही अथवा जस्त अयस्क (कैलामाइन) के रूप में किया जाता था। सीधे कैलामाइन के उपयोग से पीतल निर्माण आज प्रचलित नहीं है। अयस्क वाले पीतल में जस्त २८ प्रतिशत जबकि दूसरे में यह कम ही यानी ६ प्रतिशत होता था और यही पीतल आज के व्रोंज पीतल के समकक्ष ठहरता है। अधिक जस्त वाले ४० प्रतिशत तक कई प्रकार के पीतल भी आजकल तैयार किये जाते हैं। व्रोंज भी आज की भांति कई प्रकार के होते थे जिनमें तांबा ८०-९० प्रतिशत तक हो सकता था। शेष जस्त एवं टिन होता था। मूर्ति निर्माण में पंचलोहा का प्रयोग किया जाता था, जिसमें वंग, तांबा, सीसा, लोहा एवं रजत का मिश्रण होता था (चरक संहिता)। कभी-कभी रजत के स्थान पर पीतल का प्रयोग किया जाता था (रसरत्न समुच्चय)। मंदिरों में आकर्षक ध्वनि उत्पन्न करने वाले घंटे न हों तो मंदिर ही क्या। इनके लिए तांबा और वंग विभिन्न अनुपातों में मिलाए जाते थे। आज के ‘बेल मेटल‘ में भी ८० प्रतिशत सीयू एवं २० प्रतिशत एसएन होता है। कुछ अन्य धातुएं भी लेशमात्र उपस्थित हो सकती है। 

 

शोध की आवश्यकता

विशिष्ट तकनीकी उपयोग के लिए कुछ अत्यंत विचित्र मिश्र धातुएं तैयार की जाती थीं। कुछ के संघटन समझ में आते हैं और कुछ अति प्राचीन संस्कृत नामों के कारण बुद्धि से परे जान पड़ते हैं। इन सभी पर शोध की नितांत आवश्यकता है। रहस्योद्घाटन हो जाने पर मानवता को अपरिमित लाभ होने की पूर्ण संभावना है। भारद्वाज मुनि के वृहद विमान शास्त्रम्‌ में विमान के यात्री कक्ष को शीतल रखने के लिए विद्युत दर्पण नामक यंत्र को तड़ित दर्पण मिश्र धातु से बनाने का विधान है जिसके विरचन के लिए १६ पदार्थों की सूची है। इनमें से अनेक अज्ञात हैं। वैमानिकी में काम आने वाली कुछ अन्य विचित्र सी लगने वाली मिश्र धातुएं इस प्रकार हैं-‘एअरोडाइनेमिक कंट्रोल‘ के कई उपकरणों के लिए अरारा ताम्र धातु का विधान है जिसमें ८४.२प्रतिशत तांबा, १५-१८प्रतिशत वंग एवं ०.०२प्रतिशत सीसा अपेक्षित था। यह मिश्र धातु आज के फॉस्फर व्रोंज से मिलती जुलती है जिसका गलनांक १००० डिग्री होता है। बाजीमुख लौह (लौह तंत्र) कुछ-कुछ फोम की प्रकृति की अत्यंत नरम, पीले रंग की मिश्र धातु है जो ध्वनि शोषक का कार्य करती थी। यह तांबा, आयरन, पायराइटीज, जस्त, सीसा, लोहा, वंग, तांबे की एक श्तेवर्णी मिश्र धातु, पंचानन, अभ्रक एवं सोंठ के मिश्रण से तैयार की जाती थी। शक्ति गर्भ लौह के लिए कांटा (कास्ट आयरन) ३७ प्रतिशत, क्रौंचिका स्टील ३३प्रतिशत तथा सामान्य लौह अथवा कोई भिन्न स्टील ३३ प्रतिशत का मिश्रण अनुशंसित है। इसी प्रकार एक अत्यंत हल्की यद्यपि कठोर मिश्र धातु बैडाल लौह १५ तथा घंटारव लौह १२ पदार्थों के मिश्रण से बनाई जाती थी, जिनमें से अनेक नाम अभी समझने शेष हैं।

 

शत्रु विमान से बचने के लिए अथवा उन पर आक्रमण के लिए विषैली धूम फेंकने वाले यंत्र के निर्माण के लिए क्षौंडीर लौह मिश्र धातु की अनुशंसा है जिसके निर्माण में पारद, वीरा, क्रौंचिका, कास्ट आयरन, रजत, माध्विकम एवं वंग की आवश्यकता पड़ती थी। त्रिपुर विमान जो संभवत: अंतरिक्ष विमान था, में लगे यंत्रों के निर्माण के लिए अनेक मिश्र धातुओं का वर्णन है जिसमें से एक त्रिनेत्र लौह है जो संभवत: क्रोम वैनेडियम स्टील था-यद्यपि उसका संघटन आज के इस प्रकार के स्टील से भिन्न था।

 

हमारी रसायन संबंधी विरासत विशाल है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अनेक रासायनिक प्रक्रियाओं के संपादन के लिए आवश्यक रसायन एवं अभिकर्मक वानस्पतिक तथा जैविक स्रोतों से प्राप्त किए जाते थे। उत्प्रेरकों, अम्लों एवं क्षारों पर भी यह बात लागू होती है। इसी कारण प्राचीन भारतीय रसायन का रूप आधुनिक रसायन की अपेक्षा कम प्रदूषणकारी था।

 

इस लेख का उद्देश्य यह सिद्ध करना नहीं है कि प्राचीन रसायन आज से अधिक समुन्नत और अधिक संभावनाओं से परिपूर्ण था। यह निर्विवाद है कि आज के युग में रसायनशास्त्र ने अकल्पनीय प्रगति की है। उद्देश्य तो केवल मात्र इस भ्रम का उच्छेद करना है कि हम नितांत अज्ञानी थे। यह तो अब स्पष्ट है कि रसायन के क्षेत्र में हमारी परंपरा अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रही है। साथ ही यह कहना भी समीचीन होगा कि इस पारंपरिक ज्ञान की बहुत सारी अनुद्घाटित बातों पर गहन शोध की अपेक्षा है जिससे आज का रसायनशास्त्र निश्चित रूप से अधिक समृद्धशाली बनेगा।

 

प्राचीन भारत में रसायन की परम्परा-२ : आश्चर्यचकित करती हैं भारतीय भट्ठियां

 

 

डा. ओम प्रभात अग्रवाल 

(सेवानिवृत्त अध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक हरियाणा)

 

 

 

इस लेख के पहले खंड में हमने पढ़ा कि किस प्रकार आज के विद्वानों द्वारा सम्मत सभी तीन मानदंडों पर भारत में रसायन की परम्परा की प्राचीनता सिद्ध होती है। इसके साथ ही अब समीचीन होगा कि हम प्राचीन भारतीय सैद्धांन्तिक एवं प्रायोगिक रसायन पर विस्तार से चर्चा कर लें।

 

सैद्धांतिक रसायन शास्त्र का मूलाधार परमाणुओं की प्रकृति का सही ज्ञान एवं उनमें परस्पर बंधता का गुण है। परमाणु संबंधी आधुनिक मान्यता के आदि पुरुष डाल्टन माने जाते हैं। परंतु उनसे बहुत पहले ईसा से ६०० वर्ष पूर्व ही कणाद मुनि ने परमाणुओं के संबंध में जिन धारणाओं का प्रतिपादन किया, उनसे आश्चर्यजनक रूप से डाल्टन की संकल्पना मेल खाती है। कणाद ने न केवल परमाणुओं को तत्वों की ऐसी लघुतम अविभाज्य इकाई माना जिनमें इस तत्व के समस्त गुण उपस्थित होते हैं बल्कि ऐसी इकाई को ‘परमाणु‘ नाम भी उन्होंने ही दिया तथा यह भी कहा कि परमाणु स्वतंत्र नहीं रह सकते। 

 

कणाद की धारणा

कणाद की परमाणु संबंधी यह धारणा उनके वैशेषिक सूत्र में निहित है। कणाद आगे यह भी कहते हैं कि एक प्रकार के दो परमाणु संयुक्त होकर ‘द्विणुक‘ का निर्माण कर सकते हैं। यह द्विणुक ही आज के रसायनज्ञों का ‘वायनरी मालिक्यूल‘ लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि भिन्न भिन्न पदार्थों के परमाणु भी आपस में संयुक्त हो सकते हैं। यहां निश्चित रूप से कणाद रासायनिक बंधता की ओर इंगित कर रहे हैं। वैशेषिक सूत्र में परमाणुओं को सतत गतिशील भी माना गया है तथा द्रव्य के संरक्षण (कन्सर्वेशन आफ मैटर) की भी बात कही गई है। ये बातें भी आधुनिक मान्यताओं के संगत हैं।

 

रासायनिक बंधता को और अधिक स्पष्ट करते हुए जैन दर्शन में कहा गया है कि कुछ परमाणुओं में स्निग्धता और कुछ में ‘रुक्षता‘ के गुण होते हैं तथा ऐसी भिन्न प्रकृति वाले परमाणु आपस में सहजता से संयुक्त हो सकते हैं जबकि समान प्रकृति के परमाणुओं में सामान्यत: संयोग की प्रवृत्ति नहीं होती। ऐसा आभास होता है कि जैसे आयनी बंधता की व्याख्या की जा रही है।

 

प्रायोगिक रसायन में काम आने वाले उपकरणों पर भी प्राचीन भारतीय रसायन शास्त्र में विस्तार से चर्चा हुई है। रासायनिक प्रयोगों एवं औषधि विरचन के लिए रसायनज्ञ ३२ कोटि के उपकरणों का प्रयोग अपनी प्रयोगशाला में करते थे, जिनकी सहायता से आसवन, संघनन, ऊर्ध्वपातन, द्रवण आदि सभी प्रकार की क्रियाएं संपादित की जा सकती थीं। इनमें से बहुतों का व्यवहार आज भी औषधि विरचन के लिए वैद्य कर रहे हैं। प्रयोगशालाओं के लेआउट का भी वर्णन रसरत्न समुच्चय में मिलता है। ग्रंथों में अनेक प्रकार की कुंडियों, भठ्ठियों, धौंकानियों एवं क्रूसिबिलों के विशद विवरण उपलब्ध हैं। इनकी भिन्नता धातुकर्म अथवा रासायनिक प्रयोगों के लिए उपयुक्त ताप प्रदान करने की उनकी क्षमता के कारण थी। रसरत्न समुच्चय में महागजपुट, गजपुट, वराहपुट, कुक्कुटपुट एवं कपोतपुट भठ्ठियों का वर्णन है, जो केवल प्रयुक्त उपलों की संख्या और उनकी व्यवस्था के आधार पर ७५०० से ९००० तक का भिन्न-भिन्न ताप उत्पन्न करने में समर्थ थीं। उदाहरणार्थ, महागजपुट के लिए २०००, परंतु निम्नतम ताप उत्पन्न करने वाली कपोतपुट के लिए केवल ८ उपलों की आवश्यकता पड़ती थी। इनके द्वारा उत्पन्न तापों की भिन्नता आधुनिक तकनीकी द्वारा सिद्ध हो चुकी है। ९००० से भी अधिक ताप के लिए वाग्भट्ट ने चार भठ्ठियों का वर्णन किया है- अंगारकोष्ठी, पातालकोष्ठी, गोरकोष्ठी एवं मूषकोष्ठी। पातालकोष्ठी का वर्णन लोहे के धातुकर्म में प्रयुक्त होने वाली आधुनिक ‘पिट फर्नेस‘ से अत्यधिक साम्य रखता है। धातु प्रगलन के लिए भट्ठियों से उच्च ताप प्राप्त करने के लिए भारद्वाज मुनि के वृहद्‌ विमान शास्त्र में ५३२ प्रकार की धौंकनियों का वर्णन किया गया है। इसी ग्रंथ में ४०७ प्रकार की क्रूसिबिलों की भी चर्चा की गई है। इनमें से कुछ के नाम हैं- पंचास्यक, त्रुटि, शुंडालक आदि। सोमदेव के रसेंद्र चूड़ामणि में पारद-रसायन के संदर्भ में जिस ऊर्घ्वपातन यंत्र तथा कोष्ठिका यंत्र का वर्णन है, उसका आविष्कार किसी नंदी नामक व्यक्ति ने किया था। 

 

धातुकर्म कौशल

रसायन के क्षेत्र में विश्व में प्राचीन भारत की प्रसिद्धि मुख्यत: अपने धातुकर्म कौशल के लिए रही है। मध्यकाल में भारत का इस्पात यूरोप, चीन और मध्यपूर्व के देशों तक पहुंचा। इतिहास में दमिश्क की जिन अपूर्व तलवारों की प्रसिद्धि है वे दक्षिण भारत के इस्पात से ही बनाई जाती थीं। आज से १५०० वर्ष पूर्व निर्मित और आज भी जंग से सर्वथा मुक्त दिल्ली के महरौली का स्तंभ भारतीय धातुकर्म की श्रेष्ठता का प्रतीक है। यही बात व्रिटिश म्यूजियम में रखे बिहार से प्राप्त चौथी शताब्दी की तांबे से बनी बुद्ध की २.१ मीटर ऊंची मूर्ति के बारे में भी कही जा सकती है। भारत में अत्यंत शुद्ध जस्ता एवं पीतल के उत्पादन भी प्रमाणित हैं।

 

कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र‘ में क़ड्ढ, क्द्व, ॠढ़, ॠद्व, घ्ड (लोहा, तांबा, रजत, स्वर्ण, सीसा) एवं च्द (टिन) धातुओं के अयस्कों की सटीक पहचान उपलब्ध है। लोहे के लिए रक्ताभ भूरे हेमेटाइट (सिंधुद्रव) एवं कौवे के अंडे के रंग वाले मैग्नेटाइट (बैक्रुंटक) तांबे के लिए कॉपर पाइराइटिज, मैलाकाइट, एज्यूराइट एवं नेटिव कॉपर, रजत के लिए नेटिव सिल्वर, स्वर्ण के लिए नेटिव गोल्ड, सीसा के लिए रजत अथवा स्वर्ण मिश्रित गैलेना एवं बंग के लिए कैसेटिराइट अयस्कों की उनके रंगों के आधार पर पहचान वर्णित है। संस्कृत साहित्य में पारद के सिनाबार तथा जस्त के कैलामाइन अयस्कों का समुचित वर्णन उपलब्ध है। अर्थशास्त्र में ही अनेकों अयस्कों में मिश्रित कार्बनिक अशुद्धियों से मुक्ति की क्रिया भी वर्णित है। इसके लिए उच्च ताप पर गर्म कर विघटित करने का विधान है। अकार्बनिक अशुद्धियों से मुक्ति के लिए रसरत्न समुच्चय में अयस्क के साथ बाह्य पदार्थ, फ्लक्स को मिलाकर और इस मिश्रण को गर्म कर उन्हें धातुमल के रूप में अलग कर देने का विधान है। धातु विरचन के सभी उत्खनन स्थलों पर ये फ्लक्स प्राप्त हुए हैं। उदाहरणार्थ, सिलिका के निष्कासन के लिए चूना पत्थर का प्रयोग आम बात थी ताकि कैल्सियम सिलिकेट पृथक हो सके। ये सभी बातें आज के धातुकर्म विज्ञान से असंगत हैं। सामान्य धातुओं में लोहे का गलनांक सर्वाधिक है- १५०००। हमारे वैज्ञानिक पूर्वज इस उच्च ताप को उत्पन्न करने में सफल रहे थे। बताया ही जा चुका है कि इसके लिए प्रयुक्त पातालकोष्ठी भठ्ठी आज की पिट फर्नेस से मिलती-जुलती थी। अन्य तीन भठ्ठियों-अंगारकोष्ठी, मूषकोष्ठी एवं गारकोष्ठी के उपयोग की भी अनुशंसा वाग्भट्ट ने की है। वाग्भट्ट ने ही लौह धातुकर्म के लिए भर्जन एवं निस्पातन क्रियाओं का भी सांगोपांग वर्णन किया है। लौह अयस्क के निस्पातन के लिए हिंगुल (गंधक एवं पारद) का उपयोग किया जाता था तथा भर्जन के लिए छिछली भठ्ठियों की अनुशंसा की गई है, जो पूर्णत: वैज्ञानिक है। इन प्रक्रियाओं में आक्सीकृत आर्सेनिक, गंधक, कार्बन आदि मुक्त हो जाते थे तथा फेरस आक्साइड, फेरिक में परिवर्तित हो जाता था। सुखद आश्चर्य की बात है कि रसरत्न समुच्चय में छह प्रकार के कार्बीनीकृत इस्पातों का उल्लेख है। बृहत्त संहिता में लोहे के कार्बोनीकरण की विधि सम्पूर्ण रूप से वर्णित है। 

 

इतिहास-सम्मत तथ्य

यह इतिहास सम्मत तथ्य है कि विश्व में तांबे का धातुकर्म सर्वप्रथम भारत में ही प्रारंभ हुआ। मेहरगण के उत्खनन में तांबे के ८००० वर्ष पुराने नमूने मिले हैं। उत्खनन में ही अयस्कों से तांबा प्राप्त करने वाली भठ्ठियों के भी अवशेष मिले हैं तथा फ्लक्स के प्रयोग से लौह को आयरन सिलिकेट के रूप में अलग करने के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

 

नागार्जुन के रस रत्नाकर में अयस्क सिनाबार से पारद को प्राप्त करने की आसवन विधि वर्णित है। ऐसी ही विधि रसरत्न समुच्चय तथा सुश्रुत एवं चरक संहिताओं में भी दी गई है तथा आसवन के लिए ढेंकी यंत्र की अनुशंसा की गई है। स्मरणीय है कि इस विधि का आधुनिक विधि से आश्चर्यजनक साम्य है। चरक ने पारद के शोधन की १०८ विधियां लिखी हैं।

 

गोविंद भागवत्पाद ने अपने रस हृदयतंत्र में पारद को सीसा एवं वंग से पृथक करने की विधि लिखी है। रसार्णवम में वंग के धातुकर्म का वर्णन करते हुए सीसा के धातुकर्म का भी उल्लेख किया गया है। सीसा को अयस्क से प्राप्त करने के लिए हाथी की हड्डियों तथा वंग के लिए भैंसे की हड्डियों के प्रयोग का विधान दिया गया है। स्पष्टत: हड्डियों का कैल्सियम फ्लक्स के रूप में कार्य करते हुए अशुद्धियों को कैल्सियम सिलिकेट धातुमल के रूप में पृथक कर देता था। आज भी आधारभूत प्रक्रिया यही है यद्यपि कैल्सियम को जैविक श्रोत के रूप में न प्रयोग कर अकार्बनिक यौगिक के रूप में मिलाया जाता है। कैसेटिराइट के आक्सीकृत वंग अयस्क के अपचयन के लिए विशिष्ट वनस्पतियों की अनुशंसा की गई है, जो कार्बन के श्रोत का कार्य करती थीं। 

 

अद्भुत मिश्र धातु

जस्त एवं अन्य धातु, जो प्राचीन भारत में अपनी अद्भुत मिश्र धातु निर्माण क्षमता के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण थी, इन्हें कैलेमाइन अयस्क से प्राप्त किया जाता था। इसके धातुकर्म की भठ्ठियां, जो राजस्थान में प्राप्त हुई हैं, वे ईसा पूर्व ३००० से २००० वर्ष पूर्व तक की हैं। धातुकर्म में मुख्य पद आसवन का ही है जो आधुनिक समय में भी प्रासांगिक है। रसरत्न समुच्चय में संपूर्ण विधि वर्णित है। स्मरणीय है कि १५९७ में लिबावियस नामक व्यक्ति इसे भारत से लेकर यूरोप पहुंचा। १७४३ में विलियम चैंपियन नामक अंग्रेज ने कैलामाइन अयस्क आधारित धातुकर्म के आविष्कार का दावा करते हुए इसके पेटेंट के लिए प्रार्थना पत्र दिया। परंतु कलई खुल गई और पता चला कि वह समस्त तकनीकी भारत में राजस्थान की जवार खानों से लेकर गया था। इसके लिए उसकी अत्यधिक भर्त्सना की गई।

 

नागार्जुन के रस रत्नाकर में रजत के धातुकर्म का वर्णन तो विस्मयकारी है। नेटिव सिल्वर (अशुद्ध रजत) को सीसा और भस्म के साथ मिलाकर लोहे की कुंडी में पिघलाइये, शुद्ध रजत प्राप्त हो जाएगा। गैलेना अयस्क, जो रजत और सीसे का एक प्रकार का एलाय है, को तो बिना बाहर से सीसा मिलाए ही गलाये जाने का विधान है। यह विधि आज की क्यूफ्लेशन विधि से आश्चर्यजनक साम्य रखती है। अंतर केवल इतना है कि आज की विधि में क्यूपेल (कुंडी) के अंदर किसी संरंध्र पदार्थ का लेप किया जाता है जबकि प्राचीन काल में बाहर से मिलाई गई भस्म यही कार्य करती थी। दृष्टव्य है कि कौटिल्य के काल में लोहे की कुंडी के स्थान पर खोपड़ी के प्रयोग का वर्णन है। यहां यह खोपड़ी भी संरंध्र पदार्थ का ही कार्य करती थी, जिसमें सीसा अवशोषित हो जाता होगा।

 

कौटिल्य ने लिखा है कि स्वर्ण को नेटिव रूप में नदियों के जल अथवा चट्टानों से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी चट्टानें पीताभ अथवा हल्के पीत-गुलाबी रंग की होती हैं और इन्हें तोड़ने पर नीली धरियां दृश्य हो जाती हैं। यह अत्यंत सटीक वर्णन है। अत्यंत शुद्ध धातु की प्राप्ति के लिए जैविक पदार्थों के साथ गर्म करने का विधान है। सीसे के साथ मिलाकर भी शुद्ध करने की अनुशंसा है जो आज की पद्धति में कोई स्थान नहीं रखती।

 

हिंदू पंचांग हिंदू धर्म के लोगों द्वारा माना जाने वाला कैलेंडर है। पंचांग का अर्थ है, पांच अंग। ये पांच अंग हैं, तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धराए हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। अलग-अलग रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में 12 महीने होते हैं। हर महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। 12 मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ।

महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति से रखा जाता है। यह 12 राशियां बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घड़ी 48 पल छोटा है। इसीलिए हर 3 वर्ष मे इसमें एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।

 

ये हैं नक्षत्रों के आधार पर 12 महीने

 

इन बारह महीनों के नाम आकाश मण्डल के नक्षत्रों में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गए हैं। जिस महीने में जो नक्षत्र आकाश में रात की शुरुआत से लेकर अंत तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है।

  1. चैत्र-चित्रा, स्वाति।

  2. वैशाख- विशाखा, अनुराधा।

  3. ज्येष्ठ - ज्येष्ठा, मूल।

  4. आषाढ़- पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा।

  5. श्रावण- श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा।

  6. भाद्रपद - पूर्व-भाद्र, उत्तर-भाद्र।

  7. आश्विन- रेवती, अश्विन, भरणी।

  8. कार्तिक- कृतिका, रोहणी। 

  9. मार्गशीर्ष- मृगशिरा, आर्द्रा।

  10. पौष- पुनर्वसु, पुष्य।

  11. माघ- अश्लेषा, मघा।

  12. फाल्गुन- पूर्व फाल्गुन, उत्तर फाल्गुन, हस्त।

महाभारतम् ( Sanskrit Essay on Mahabharata )

महाभारतम् महर्षिणा वेदव्यासेन विरचितः बहुप्रसिद्धः इतिहासः विद्यते। अस्मिन् ग्रन्थे कौरव-पाण्डवानां महायुद्दं मुख्य-विषयरूपेण वर्णितमस्ति। मानवजीवनस्य धर्मार्थ-काम-मोक्ष-रूपाः समस्तपुरुषार्थाः अत्र विशालग्रन्थे सन्निवेशिताः। अस्य महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्‌भगवद्‌गीता विद्यते। भगवता कृष्णेन मोहग्रस्तम् अर्जुनं प्रति ज्ञान-कर्म-भक्ति-विषयकः उपदेशः गीतायां प्रदत्तः। अस्यां गीतायामपि अष्टादश अध्यायाः सन्ति। मानव-जीवनस्य विविधविषयाः अत्र समीचीनतया प्रतिपादिताः सन्ति। इयं विश्वजनीन-कृतिः कालजयिनी चिरन्तनी एव

महाभारतम्(आङ्ग्लभाषा Mahabharata) महर्षिणा वेदव्यासेन विरचितः बहुप्रसिद्धः इतिहासः विद्यते। अस्मिन् ग्रन्थे कौरव-पाण्डवानां महायुद्धं मुख्य-विषयरूपेण वर्णितमस्ति। मानवजीवनस्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-रूपाः समस्तपुरुषार्थाः अत्र विशालग्रन्थे सन्निवेशिताः। अस्य महाभारतस्य भीष्मपर्वणिश्रीमद्‌भगवद्‌गीता विद्यते। भगवता कृष्णेन मोहग्रस्तम् अर्जुनं प्रति ज्ञान-कर्म-भक्ति-विषयकः उपदेशः गीतायां प्रदत्तः। अस्यां गीतायामपि अष्टादश अध्यायाः सन्ति। मानव-जीवनस्य विविधविषयाः अत्र समीचीनतया प्रतिपादिताः सन्ति। इयं विश्वजनीन-कृतिः कालजयिनी चिरन्तनी एव।

महाभारतस्य रचनाकालः नामकरणञ्च

महाभारतग्रन्थः त्रिभिः सवंत्सरैः विरचितं च -

त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थाय कृष्णद्वैपायनो मुनिः।

महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम्॥

इदं प्रायः सर्वे भारतीया विद्वांसो मन्यन्ते यत् महाभारतं प्राग् जयनाम्ना ततो भारतनाम्ना ततः परतश्च महाभारतनाम्ना प्रसिद्धम् । सूक्ष्मेक्षिकयाऽवलोकनेन ज्ञायते यत् - महाभारतस्य प्रगते चरणत्रयं विद्यते। -

प्रथमे चरणे - जयनामकं काव्यमेतत् ८८०० श्लोकपरिमितं व्यासकृतं धर्मचर्चाम् आश्रित्य महर्षि व्यासेन स्वशिष्याय वैशम्पायनाय श्रावितमभूत्।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

प्रत्येकस्य अध्यायस्य आदौ विद्यमानः अयं प्रसिद्धः श्लोकः इदं निरूपयति ।

द्वितीये चरणे - भारतनामकं महाकाव्यमेतत् वैशम्पायनकृतं २४ सहस्रश्लोकपरिमितं (चतुर्विंशतिसाहस्री) वैशम्पायनेन अर्जुनस्य प्रपौत्राय जनमेजयाय नागयज्ञे श्रावितमभूत्।

तृतीये चरणे - महाभारतनामकं महाकव्यमेतत् लोमहर्षपुत्रेण सौतिकेन रचितं - एकलक्षश्लोकपरिमितं नैमिषारण्ये यज्ञकाले शौनकादिभ्यः ऋषिभ्यः श्रावितमभूत्। एवञ्च आख्यानमिदं त्रिभिर्वक्तृभिः महर्षिभिः विभिन्नश्रोतृभ्यः श्रावितम्।

महाभारतस्य अन्ते विद्यमानेन श्लोकेन इदं प्रमाणितं भवति -

उक्तं शतसहस्राणां श्लोकानामिदमुत्तमम्।

 

अस्य ग्रन्थस्य नूतनतमस्य रूपस्य नाम शतसाहस्री संहिता अपि अस्ति।

महाभारतं कस्मिन् शास्त्रेऽन्तर्भवति

प्रथमं महाभारतम् इतिहासः पुराणम् आख्यानकञ्चेति नामभिः आख्यायते स्म । साम्प्रतिकास्तु महाभारतम् आचारशास्त्रम् नीतिशास्त्रम् धर्मार्थकाममोक्षाख्यचतुर्वर्गसाधनम् चामनन्ति । भारतं पञ्चमो वेदः इति सर्वत्र प्रचारितम् । सर्वत्रास्मिन् ग्रन्थे वैष्ण्वसिद्धान्तानां प्रमुखत्वेन प्रतिपादनात् महाभारतं वैष्णवस्मृतिरप्याख्यायते । महाभारतस्य अशीतिप्रतिशतभागोऽनेकविधोपदेशमयः, विंशतिप्रतिशतभाग एवेतिहासप्रतिपादक इति अस्य नीतिशास्त्रेषु गणनोचिता ।

महाभारतस्य रचनाकालः

सम्प्रत्युपलभ्यमानं महाभारतं मूलमहाभारतात् परतो बहुषु शतकेषु व्यतीतेष्वेव निर्मितं स्यादतो मूलमहाभारतस्य जयाभिधानस्य वर्तमानमहाभारतात् पूर्वकालिकत्वं निश्चितम् । अत्र वर्तमानमहाभारतस्य रचनाकालसम्बन्धे विचारणीयमस्ति, तत्र –

१. ख्रीष्टैकादशशतके जातेन क्षेमेन्द्रेण कृतो भारतमञ्जरीनामा ग्रन्थः कथायां वर्तमानमहाभारतमनुहरतीति वर्तमानमहाभारतस्य एकादशशतकपूर्वकालिकत्वं सर्वथा सिद्धम् ।
२. अष्टमशतकोत्तरार्धे जातः आद्यशङ्कराचार्यः महाभारतं स्त्रीभिः धर्मज्ञानाय अध्येयत्वेन आदिशन्ति, तेन महाभारतस्य ततः पूर्वकालिकत्वं सिद्धम् ।
३. अष्टमशतकोत्पन्नाः कुमारिलभट्टाः महाभारतस्य बहूनि पर्वाणि स्मरन्ति ।
४. सप्तमशतकोत्पन्ना बाणसुबन्धुप्रभृतयः कवयो महाभारतस्य अष्टादश पर्वाणि हरिवंशं च स्मरन्ति ।
५. कम्बोडियानामके भारतस्य प्राचीनोपनिवेशे षष्ठशतकसमीपे उत्कीर्णात् शिलालेखात् ज्ञायते यत् तत्रत्याय कस्मैचिन्मन्दिराय रामायणमहाभारतग्रन्थौ भारतेन प्रहितौ । तत्कथाप्रबन्धोऽपि भारतेन कृतः ।
६. यवबालिप्रभृतिषु द्वीपेषु षष्ठशतके महाभारतमवर्त्तत, ततोऽपि पूर्वं तिब्बतभाषायां महाभारतस्यानुवादो जातः ।
७. चतुर्थपञ्चमशतकलिखितेषु दानपत्रकेषु स्मृतिरूपेण महाभारतवचनानि निर्दिष्टानि दृष्टानि ।
८. ४६२ स्त्रीष्टोत्की-एकत्र शिलालेखे पाराशर्यव्यासस्य लक्षश्लोकात्मकस्य महाभारतप्रणेतृत्वम् उल्लिखति ।
९. सीरियादेशभाषायाम् उपलभ्यमानस्य शान्तिपर्वाध्यायत्रयस्य साक्ष्येण हर्टलमहोदयः प्रमाणयति यत् प्रचलितं महाभारतम् ई.पू. पञ्चमशतकनिबद्धात् महाभारतात् न भिद्यते इति ।
१०. डयोन क्राइसोस्तोम (Dion Chyrsostom) महोदयस्य साक्ष्येण प्रतीयते यत् ५० ख्रीष्टाब्दकाले लक्षपद्यात्मकं महाभारतं दक्षिणपथे लब्धप्रचारमासीत् इति ।
११. ख्रिष्टप्रथमशतके स्थितेन वज्रसूचीकृत्ताश्वघोषेण हरिवंशस्थ पद्यमेकमुद्धतम् । एभिः सर्वैः समुदितैरेतत् सिद्धं यत् ख्रीष्टशतकप्रारम्भे महाभारतम् अवश्यम् अवर्तत । अपि च –
(क) पाणिनिः महाभारतं जानाति स्मेति डल्ह्मैन (Dalhmann) साक्ष्येण प्रतीयते ।
(ख) ख्रीष्टपूर्वपञ्चमशतकप्रणीते आश्वलायनगृह्यसूत्रे महाभारतस्य उल्लेखो दृश्यते ।
(ग) ४०० ई.पू समये निर्मिते बौधायनधर्मसूत्रे महाभारतस्योल्लेखो दृश्यते ।
(घ) बौधायनगृह्यसूत्रे महाभारतीयं विष्णुसहस्रनामोद्ध्रियते स्म ।
(ङ) महाभारतीयशान्तिपर्वणि विष्णोर्दशावतारगणनाकालेबुद्धस्य नाम नायाति ।
(च) मेगास्थनीजप्रणीते भारतवर्णने याः कथाः ता महाभारतात् एव प्राप्ताः ।
(छ) ब्रह्म सर्वदेवज्येष्ठतया महाभारते प्रतिपादितः । पालिभाषासाहित्येन ज्ञायते यद् ब्रह्मणो ज्यैष्ठत्वं ख्रीष्टपूर्वपञ्चमशतकात् प्रागेव प्ररूढप्रचारमासीत् ।
(ज) ज्यौतिषप्रमाणैः अपि कतिपये विद्वांसः कल्पयन्ति यत् वर्त्तमानं महाभारतम् ५०० ई.पू. समयात् प्रागेव निर्मितं न ततः परम् ।
अतः सर्वसमीक्षया महाभारतम् ५०० ई.पू. समयतः परतो न निर्मितं किन्तु कदाचित् पूर्वमेव निर्मितमिति प्रतीयते ।

महाभारतकथासारांशः

महाभारतस्य संक्षेपेण वर्णिता कथा एवं वर्तते - उत्तरभारतस्य राज्ञो दुष्यन्तस्य पुत्रस्य भरतस्य वंशधरस्य शान्तनोः प्रपौत्रो -धृतराष्टपाण्डवौ आस्ताम्। अग्रजन्मा धृतराष्टः नेत्रहीनः इति हेतोः सर्वैः पाण्डुरेव राजसिंहासनेऽभिषिक्तः। कालान्तरेण पाण्डुः पञ्चत्वं प्राप्तः। तदा पञ्चपाण्डवाः - युधिष्ठिरः - भीमः - अर्जुनः - नकुलः - सहदेवश्च निखिलानि शास्त्राणि वेदाञ्च अधीतवमन्तः । प्रकृतयः युधिष्ठिस्य शौचेन, भीमसेनस्य धृत्या, अर्जुनस्य विक्रमेण, नकुलसहदेवयोः गुरुशुश्रूषया, शान्त्या विनयेन च, समेषां तेषां शौर्यगुणेन च अति सन्तुष्टा अभवन्।

पाण्डवानाम् अभ्युदयम् असहमानः दुर्योधनः छलेन तेषां राज्यम् अपहर्तुं बहुकृतप्रयत्नोऽपि विफलोऽभवत्। तदा स्वमातुलशकुनिसाहाय्येन घूतक्रीडायां कपटेन पाण्डवान् पराजित्य द्रौपदीञ्च स्वानुजेन दुःशासनेन सभामानाय्य अपमाननं कर्तुं प्रायतत । श्रीकृष्णेन रक्षिता द्रौपदी। पराजिताः पाण्डवाः कृतसमयानुसारं द्वादशवर्षपर्यन्तं वनवासस्य, एकवर्ष-अज्ञातवासस्य च कठिनाम् अवस्थाम् असहन्। ततोऽरण्यात् निवृत्य स्वराज्यम् अयाचन्त । दौत्यार्थं पाण्डवप्रतिनिधिः भूत्वा स्वयं श्रीकृष्णः गतः। परन्तु स्वार्थपरायणः दुर्योधनस्तु - ’केशव ! युद्धं विना सुच्याग्रपरिमितं भूमिमपि न दास्यामि’ इति दृढचित्तः सन् अवदत् ।

फलतः कौरव-पाण्डवानां मध्ये भयङ्करं युद्धं सञ्जातम्। कौरवाः पराजिताः, पाण्डवेषु ज्येष्ठः युधिष्ठिरः राजसिंहासनम् आरोहत् । कालक्रमेण अभिमन्योः पुत्रं परीक्षितं हस्तिनापुरस्य अधिपतिनं विधाय सर्वे पाण्डवाः द्रौपदी च हिमालयं प्रति अगच्छन् -तत्रैव कालकवलतां गताश्च।

महाभारतस्यादरः

रामायणस्य तुलनायां यद्यपि महाभारतस्य प्रचारः अल्पः तथापि महत्त्वदृष्ट्या महाभारतं विश्वस्य कस्मादपि ग्रन्थान्न हीयते । महाभारतं तदानीन्तनभारतीयसमाजनीतिप्रभृतिज्ञातव्यं बोधयति, महाभारतं तदानीन्तनीं भारतीयां सभ्यतां प्रकाशयति । प्रमाणग्रन्थतयैवास्य पञ्चमवेदसंज्ञा जाता । यथा रामायणाधारेण बहवो ग्रन्था अरच्यन्त तथैव महाभारताधारेणापि । एतत् सर्वमस्य ग्रन्थस्य महत्त्वे साक्षिभूतम् । word gedacht

महाभारतस्य विभागाः

महाभारतमष्टादशसु पर्वसु विभक्तं वर्त्तते, तस्मिंश्च आदि-सभा-वन-विराट-उद्योग-भीष्म-द्रोण-कर्ण-शल्य-सौप्तिक-स्त्री-शान्ति-अनुशासन-अश्वमेध-आश्रमवासि-महाप्रास्थानिक –स्वर्गारोहणपर्वणि सन्ति ।

अनुषङ्गतः शकुन्तलोपाख्यान –मत्स्योपाख्यान –रामोपाख्यान-शिबिकथा-सावित्रीकथा-नलोपाख्यानादीनि वर्णितानि । युद्धवर्णनमात्रं न व्यासस्य लक्ष्यमपि तु भौतिकजीवनस्यासारतां प्रकाश्य प्राणिनां मोक्षमार्गे प्रवर्त्तनमेव व्यासस्य महाभारतप्रणयने उद्देश्यमासीत्, अत एवात्र शान्तो रसः प्रधानभूतः वीरस्तु रसोऽङ्गभावं गतः ।

क्र.सं

पर्व

अध्यायाः

श्लोकाः

आदिपर्व

२२७

८८८४

सभापर्व

७८

२५५१

वनपर्व

२६९

११६६४

विराटपर्व

६७

२०५०

उद्योगपर्व

१८६

६६९८

भीष्मपर्व

११७

५८८४

द्रोणपर्व

१७०

८९०९

कर्णपर्व

६९

४९६४

शल्यपर्व

५९

३२२०

१०

सौप्तिकपर्व

१८

८७०

११

स्त्रीपर्व

२७

७७५

१२

शान्तिपर्व

३३९

४७३२

१३

अनुशासनपर्व

१४६

८०००

१४

अश्वमेधपर्व

१०३

३३२०

१५

आश्रमवासिकपर्व

४२

१५०६

१६

मौसलपर्व

३२०

१७

महाप्रस्थानिकपर्व

३२०

१८

स्वर्गारोहणपर्व

२०१

१९

हरिवंशः

१२०००

हरिवंशोनाम खिलपर्वापि योजयित्वा आहत्य १९३६ अध्यायाः १६८३६ श्लोकाश्च सन्ति महाभारते।अस्मिन् महाभारते एव विदुरनीतिः सनत्सुजातीयम् भगवद्गीता अनुगीत चेति चत्वारः तत्त्वोपदेशग्रन्थाः भवन्ति। विदुरनीतिः द्योगपर्वणि ३३ तः ४० अध्यायपर्यन्तम् भवति। सनत्सुजातीयं द्योगपर्वणि ४९ तः ४६, पर्यन्तम् भगवद्गीता भीष्मपर्वणि २५ तः ४२ पर्यन्तम् अनुगीता अश्वमोधीकपर्वणि १६ तः५१ पर्यन्तम् च वर्तते।

महाभारतस्य वैशिष्ट्यम्

व्यासस्य कृतिरियं सर्वैरितिहास इत्युच्यते यतोऽत्र वीराणां पुण्या गाथा वर्णिता । अयं ग्रन्थो धार्मिकग्रन्थो येन लोकः स्वकल्याणं गवेषयति । अत्रैव ग्रन्थे गीतारत्नं विद्यते या दुग्धेव प्रतीयतेऽनवरतं दुह्यमानाऽपि । गीताग्रन्थस्यादरो महाभारतस्यैव विशिष्टतां प्रमाणयति । स्वयमेव व्यासेन महाभारतस्य प्रशंसायां यदुक्तं तदक्षरशः सत्यम् –

यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।

न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः॥

श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यत्र रोचते ।

पुंस्कोकिलागरं श्रुत्वा रुक्षा ध्वंक्षस्य वागिव ॥

श्रीवेदव्यासस्य महत्वाकाङ्क्षेयं यद् धर्मार्थ-काम-मोक्ष-विषयकम् अखिलमपि जिज्ञासितं तथ्यम् अत्रैव लभेत, न च किञ्चिद् उच्छिष्येत इति । अतैव उच्यते -

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभम्।

यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥

महनीयोऽयं ग्रन्थः यथा वपुषा विशालः तथैव भावगाम्भीर्येण अर्थगौरवेण च। अतैव उच्यते -
महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते। महाभारतं विरचय्य श्रीव्यासः ’शिष्येभ्यः कथम् अध्यापयामि’ इति यथा चिन्तामग्नः आसीत् तदा तस्य व्यथां ज्ञात्वा स्वयं लोकगुरुः भगवान् ब्रह्मा तस्य प्रीत्यर्थं लोकानां हितकाम्यया च तत्र आगच्छत्। यथाविधि तस्योपचारं कृत्वा स्वयं श्रीव्यासः स्वग्रन्थविषयेऽवदत् - ’भगवान् ! मया इदं परमपूज्यं काव्यं कृतम् । अस्मिन् काव्ये वेदरहस्यं साङ्गोपनिषदां विषयः च विस्तारेण वर्णितः । इतिहासाः - पुराणानि - भूतं -भव्यं - भविष्यं, जरा-मृत्यु-भय-व्याधि-भावाभावः, चातुर्वर्ण्यविधानं वर्ण्यधर्माः, पृथिवी - चन्द्रः - सूर्यः - तारागणः ग्रहप्रमाणाः, सत्य-त्रेता-द्वापर-कलियुगाः, ऋग्-यजुस्-सामानि सर्वमपि वर्णितम्। तीर्थानां पुण्यक्षेत्राणां च कीर्तनं, नदी-वन-पर्वत-सागरादीनां वर्णनं, सर्वमपि प्रतिपादितं विद्यते अस्मिन् ग्रन्त्थे । परन्तु एतस्य ग्रन्थस्य कोऽपि लेखकः भुवि न विद्यते। ब्रह्मा अपि प्रत्युत्तरे - 'अन्य कोऽपि अस्मात् श्रेष्ठतरं काव्यं लेखितुं न समर्थो भवति । लेखनार्थं श्रीगणेशं स्मर' इति उक्त्वा स्वधाम अगच्छत् । एवं महाभारतं श्रीव्यासेन प्रणीतं, श्रीगणेशेन लिखितम्।
महाभारतस्य विविधविषयावगाहि - ज्ञानम्, अर्थगौरवं भावगाम्भीर्यं च प्रतिपादयितुं कतिपयानि सुभाषितानि उपस्थाप्यन्ते -

दार्शनिकभावोपेताः सूक्तयः

नवहारमिदं वेश्म, त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्, क्षेत्रज्ञाधिष्टितं (क्षेत्रज्ञ-अधिष्टितं) यो विद्वान् वेद स परः कविः ।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा लिङ्गस्य योगेन च नित्यं याति - तम् इशम् - ईड्यम् -अनुकध्पम् - अद्यं - विराजमानं तं मूढाः न पश्यन्ति।

नीतिशिक्षाविषयकाणि सुभाषितानि

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः - तस्मिन् तथा वर्तितव्यं सधर्मः मायाचारो मायया वर्तितव्यः, साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः
वृशं यत्नेन संरशेत् - वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः, क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।
न च दुर्बलोऽपि क्षत्रुः बलीयसा अवज्ञेयः
अल्पोऽपि दहत्यग्निः विषमल्पं हिनस्ति च।

अर्थशास्त्रीयाः सूक्तयः

धनमाहुः परं धर्मं, धने सर्वं प्रतिष्ठितम्।
जीवन्ति धनिनो लोके, मृताः ये त्वधनो नराः॥
धनान् कुलं प्रभवति, धनान् धर्मः प्रवर्धते।
नाधनस्यास्त्ययं लोको, न परः, पुरुषोत्तमः॥

राजनीतिविषयकाः सूक्तयः

राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं - प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम्।
राज्ञा विहीना न भवन्ति देशा, देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति॥
राज्ञा हि पूजितो धर्मस्ततः सर्वत्र पूज्यते।
यद् यदाचरते राजा तत् प्रजाभ्यः स्म रोचते॥

एवं गुणगौरवात् सर्वविषयावगाहित्वात् आचारशिक्षणात् पावनत्वात् अयं महाभारतग्रन्थः पञ्चमो वेदः इति ख्यातः। अत एव ग्रन्थश्चयित। - स्वगुणगौरवात् -त्रिदेववद् आद्रियते सम्मान्यते च -

अचतुर्वदनो ब्रह्मा हिबाहुरपरो हरिः।
अभाललोचनः शम्भुः भगवान् बादरायणः॥

वेदानां धर्मप्रधानत्वाद्, यज्ञादिकर्मकाण्डप्रतिपादनात् अध्यात्मभावविवरणाच्च न समेषां प्रियत्वम्। वेदेषु द्विजानामेव विशिष्टा गतिः, धर्मत्वेन अभिरुचिश्च। परन्तु महाभारते सर्वेषां कृते किमपि अस्ति। सर्वमनोमोहनत्वाच्च एतद् स्त्रीशूद्रादिभ्यः अपि सुलभः। अस्य पावनत्वम्, उत्कृष्टत्वं, सर्वार्थसाधकत्वं, सर्वेभ्यः सुलभत्वञ्च प्रेक्ष्य विपश्चिद्भि - पञ्चमो वेदः ’महाभारतम्’ इति साह्लादम् उद्घोष्यते। अष्टादश पर्वेषु, अनेकोपपर्वेषु च विभक्तम् महाभारतम्। अस्य मुख्यांशाः - व्यासरहस्यम् - विदुरनीतिः - भगवद्गीता च। श्री गणेशः - यदि मम लेखनी क्षणमपि अलिखन्ती न अवतिष्टेत् - तर्हि अहं लेखको भवामि इत्यवदत् । तदा भगवान् व्यासः गूढं ग्रन्थग्रान्थिम् अरचयत् -

अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च।
अहं वेद्मि, शुको वेति, सञ्जयो वेत्ति वा न वा॥

इति सन्देहः एव - अद्यापि तच्छ्लोककूटं सुदृढं ग्रथितं, गूढत्वात् तस्य अर्थः केनापि भेत्तुं न शक्यते। अतः ’व्यासरहस्यम्’ इति ज्ञातम्। विदुरनीतिः - विदुरेण मोहग्रस्तं, दुःखितम्, अशान्तं धृतराष्ट्रं प्रति उपदिष्टा राजनीतिः विदुरनीतिरिति ख्याता। सत्यवक् विदुरः निष्पक्षपाततया धर्ममार्गद्योतकः प्रवर्तकश्चासीत्। ’प्रजागर’ नामके उपपर्वणि अष्टसु अध्यायेषु विदुरनीतिः सङ्ग्रहरूपेण निरूपिताः। विदुरस्योक्तिः न केवलं धृतराष्टम् उद्दिश्य उक्ताः, परन्तु सर्वेषां व्यक्तिजीवने उपयोगार्हा एव। महाभारतरण भूमौ मोहग्रस्तम् अर्जुनं प्रति - श्रीकृष्णेन उपदिष्टा भगवद्गीता वर्तते। सर्वोत्कृष्ट विषयस्तु अस्मिन् - ’सरस्वत्याः वृष्टिः’ इति यथोराशिविभूषिते महाभारते - अहितीयः, सर्वज्ञः, सर्वशक्तिमान्, परमयोगेश्वरः, अचिन्त्यानन्त गुणगणसम्पन्नः सृष्टि-स्थिति-प्रलयकारी, विचित्रलीलाविहारी, भक्तवत्सलः, भक्तभक्तिमान्, भक्तसर्वस्वः, निखिलरसामृतसिन्धुः, प्रेमघनविग्रहः, सच्चिदानन्दघनः वासुदेवस्य भगवतः श्रीकृष्णस्य गुणगौरवस्य मनमोल्क मधुरगीतं विद्यते - भीष्मपितामहेन उक्ते ’विष्णुसहस्रनाम’ स्तवे। एतत् सर्वं मनसि निधाय एव उद्घोष्यते -

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

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अर्जुनसन्न्यासः सुभद्रा च'

अधुनातने जनजीवने

संस्कृतस्य काव्यमिदम् अद्यापि जनजीवने सुविख्यातं, प्रेरणाप्रदं च तिष्ठति। दूरदर्शने 'रामायण'धारावाहिन्याः लोकप्रियताम् अनु महाभारतम् इति धारावाहिनी प्रसारिता। बी.आर.चोपडावर्येण सृष्टा इयं धारावाहिनी स्वस्य गभीराध्ययनपूर्णचित्रणात् सर्वान् आकर्षत् । दूरदर्शनयन्त्रे बहुवाहिनीभिः समृद्धे युगेऽस्मिन्नपि इयं धारावाहिनी पुनः पुनः प्रसार्यते।

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कौरवसभायां द्रौपदीप्रलापः

इमान्यपि दृश्यताम्

भारतसावित्री

बाह्यसम्पर्कतन्तुः

महाभारतम्

 

महाभारतम्
↔ ग्रन्थकर्ता : वेदव्यासः
 

अनुक्रमणिका

  1. महाभारतम्-०१-आदिपर्व (२६० अध्यायाः)

  2. महाभारतम्-०२-सभापर्व (१०३ अध्यायाः)

  3. महाभारतम्-०३-आरण्यकपर्व (३१५ अध्यायाः) (अरण्यपर्व, वनपर्व)

  4. महाभारतम्-०४-विराटपर्व (७८ अध्यायाः)

  5. महाभारतम्-०५-उद्योगपर्व (१९६ अध्यायाः)

  6. महाभारतम्-०६-भीष्मपर्व (१२२ अध्यायाः)

  7. महाभारतम्-०७-द्रोणपर्व (२०३ अध्यायाः)

  8. महाभारतम्-०८-कर्णपर्व (१०१ अध्यायाः)

  9. महाभारतम्-०९-शल्यपर्व (६६ अध्यायाः)

  10. महाभारतम्-१०-सौप्तिकपर्व (१८ अध्यायाः)

  11. महाभारतम्-११-स्त्रीपर्व (२७ अध्यायाः)

  12. महाभारतम्-१२-शांतिपर्व (३७५ अध्यायाः)

  13. महाभारतम्-१३-अनुशासनपर्व (२७४ अध्यायाः)

  14. महाभारतम्-१४-आश्वमेधिकपर्व (११८ अध्यायाः)

  15. महाभारतम्-१५-आश्रमवासिकपर्व (४१ अध्यायाः)

  16. महाभारतम्-१६-मौसलपर्व (९ अध्यायाः)

  17. महाभारतम्-१७-महाप्रस्थानिकपर्व (३ अध्यायाः)

  18. महाभारतम्-१८-स्वर्गारोहणपर्व (६ अध्यायाः)

द्रौपद्या स्वात्मानं कामयमानस्य कीचकस्य परुषभाषणैः प्रत्याख्यानम् ।। 1 ।।

 

 

 

वैशंपायन उवाच।

4-16-1x

वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा।
महारथेषु च्छन्नेषु मासा दश समाययुः ।। 1 ।।

4-16-1a

4-16-1b

याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशांपते ।
आवसत्परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय ।। 2 ।।

4-16-2a

4-16-2b

तथा चरन्ती पाञ्चाली सुदेष्णाया निवेशने।
ता देवीं तोपयामास तथा चान्तःपुरस्त्रियः ।। 3 ।।

4-16-3a

4-16-3b

तस्मिन्वर्षे गतप्राये कीचकस्तु महाबलः।
सेनापतिर्विराटस्य ददर्श द्रुपदात्मजाम् ।। 4 ।।

4-16-4a

4-16-4b

तां दृष्ट्वा देवगर्भायां चरन्तीं देवतामिव ।
कीचकः कामयामास कामबाणप्रपीडितः ।। 5 ।।

4-16-5a

4-16-5b

स तु कामाग्निसंतप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै।
प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमब्रवीत् ।। 6 ।।

4-16-6a

4-16-6b

नेयं मया जातु पुरेह दृष्टा राज्ञी विराटस्य निवेशने शुभा।
रूपेण चोन्मादयतीव मां भृशं गन्धेन जाता मदिरेव भामिनी ।। 7 ।।

4-16-7a

4-16-7b

का देवरूपा हृदयंगमा शुभे ह्याचक्ष्व मे कस्य कुतोत्र शोभने।
चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे न चान्यदत्रौपधमस्ति मे मतम् ।। 8 ।।

4-16-8a

4-16-8b

अहो तवेयं परिचारिका शुभा प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामियम्।
अयुक्तरूपं हि करोति कर्म ते प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किंचन ।। 9 ।।

4-16-9a

4-16-9b

प्रभूतनागाश्वरथं महाजनं समृद्धियुक्तं बहुपानयोजनम्।
मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं गृहं महच्छोभयतामियं मम ।। 10 ।।

4-16-10a

4-16-10b

ततः सुदेष्णामनुमन्त्र्य कीचकस्ततः समभ्येत्य नराधिपात्मजाम्।
उवाच कृष्णामभिसान्त्वयंस्तदा मृगेन्द्रकन्यामिव जम्बुको वने ।। 11 ।।

4-16-11a

4-16-11b

का त्वं कस्यासि कल्याणि कुतो वा त्वं वरानने।
प्राप्ता विराटनगरं तत्त्वमाचक्ष्व शोभने ।। 12 ।।

4-16-12a

4-16-12b

रूपमग्र्यं तथा कान्तिः सौकुमार्यमनुत्तमम्।
कान्त्या विभाति वक्रं ते शशाङ्क इव निर्मलं ।। 13 ।।

4-16-13a

4-16-13b

नेत्रे सुविपुले सुभ्रु पद्मपत्रनिभेशुभे।
वाक्यं ते चारुसर्वाङ्गि परपुष्टरुतोपमम् ।। 14 ।।

4-16-14a

4-16-14b

एवंरूपा मया नारी काचिदन्या महीतले।
न दृष्टपूर्वा सुश्रोणि यादृशी त्वमनिन्दिते ।। 15 ।।

4-16-15a

4-16-15b

लक्ष्मीः पद्मालया का त्वमथ भूतिः सुमध्यमे।
ह्रीः श्रीः कीर्तिरथो कान्तिरासां का त्वं वरानने ।। 16 ।।

4-16-16a

4-16-16b

अतीव रूपिणी किं त्वमनङ्गविहारिणी।
अतीव भ्राजसे सुभ्रु प्रभेवेन्दोरनुत्तमा ।। 17 ।।

4-16-17a

4-16-17b

अपि चेक्षणपक्ष्माणां स्थितज्योत्स्नोपमं शुभम्।
दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम् ।। 18 ।।

4-16-18a

4-16-18b

निरीक्ष्य वक्रचन्द्रं ते लक्ष्म्याऽनुपमया युतम्।
कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत् ।। 19 ।।

4-16-19a

4-16-19b

हारालंकारयोग्यौ तु स्तनौ चोभौ शुभोभनौ ।
सुजातौ सहितौ लक्ष्म्या पीनौ वृत्तौ निरन्तरौ ।। 20 ।।

4-16-20a

4-16-20b

कुड्मलाम्बुरुहाकारौ तव सुभ्रु पयोधरौ।
कामप्रतोदाविव मां तुदतश्चारुहासिनि ।। 21 ।।

4-16-21a

4-16-21b

वलीविभङ्गचतुरं स्तनभारविनामितम्।
कराग्रसंमितं मध्यं तवेदं तनुमध्यमे ।। 22 ।।

4-16-22a

4-16-22b

दृष्ट्वैव चारुजघनं सरित्पुलिनसंनिभम्।
कामव्याधिरसाध्यो मामप्याक्रामति भामिनि ।। 23 ।।

4-16-23a

4-16-23b

जज्वाल चाग्निमदनो दावाग्निरिव निर्दयः ।
त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम् ।। 24 ।।

4-16-24a

4-16-24b

आत्मप्रदानवर्षेण संगमाम्भोधरेण च।
शमयस्व वरारोहे ज्वलन्तं मन्मथानलम् ।। 25 ।।

4-16-25a

4-16-25b

मच्चित्तोन्मादनकरा मन्मथस्य शरोत्कराः।
त्वत्सङ्गमाशानिशितास्तीव्राः शशिनिभानने ।
मह्यं विदार्य हृदयमिदं निर्दयवेगिताः ।। 26 ।।

4-16-26a

4-16-26b

4-16-26c

प्रविष्टा ह्यसितापाङ्गि प्रचण्डाश्चण्डदारुणाः।
अत्युन्मादसमारम्भाः प्रीत्युन्मादकरा मम।
आत्मप्रदानसंभोगैर्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ।। 27 ।।

4-16-27a

4-16-27b

4-16-27c

चित्रमाल्याम्बरधरा सर्वाभरणभूषिता।
कामं प्रकामं सेव त्वं मया सह विलासिनि ।। 28 ।।

4-16-28a

4-16-28b

नार्हसीहासुखं वस्तुं सुखार्हा सुखवर्जिता।
प्राप्नुह्यनुत्तमं सौख्यं मत्तस्त्वं मत्तगामिनि ।। 29 ।।

4-16-29a

4-16-29b

स्वादून्यमृतकल्पानि पेयानि विविधानि च।
पिबमाना मनोज्ञानि रममाणा यथासुखम् ।। 30 ।।

4-16-30a

4-16-30b

भोगोपचारान्विविधान्सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम्।
पानं पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ।। 31 ।।

4-16-31a

4-16-31b

इदं हि रूपं प्रथमं तवानघे निरर्थकं केवलमद्य भामिनि ।
अधार्यमाणा स्नगिवोत्तमा शुभा न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ।। 32 ।।

4-16-32a

4-16-32b

त्यजामि दारान्मम ये पुरातना भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि ।
अहं च ते सुन्दरि दासवत्स्थितः सदा भविष्ये वशगो वरानने ।। 33 ।।

4-16-33a

4-16-33b

।। इति श्रीमन्महाभारते विराटपर्वणि
कीचकवधपर्वणि षोडशोऽध्यायः ।। 16 ।।

 

भारत की विश्व को देन : गणित शास्त्र-१

 

गणित शास्त्र की परम्परा भारत में बहुत प्राचीन काल से ही रही है। गणित के महत्व को प्रतिपादित करने वाला एक श्लोक प्राचीन काल से प्रचलित है। 

 

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।

तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्‌।। (याजुष ज्योतिषम) 

 

अर्थात्‌ जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि सबसे ऊपर रहती है, उसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर स्थित है।

 

ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है- 

 

ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। 

 

यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।

 

हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता के बारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।

 

भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है। यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक "कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-

 

"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"

 

नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।

 

भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत्‌ भारती कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक "वैदिक मैथेमेटिक्स" की प्रस्तावना में किया है।

 

वे लिखते हैं "इस संदर्भ में यह कहते हर्ष होता है कि कुछ तथाकथित भारतीय विद्वानों के विपरीत आधुनिक गणित के मान्य विद्वान यथा प्रो. जी.पी. हाल्स्टैंड. प्रो. गिन्सबर्ग, प्रो. डी. मोर्गन, प्रो. हटन- जो सत्य के अन्वेषक तथा प्रेमी हैं, ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और प्राचीन भारत द्वारा गणितीय ज्ञान की प्रगति में दिए गए अप्रतिम योगदान की निष्कपट तथा मुक्त कंठ से भूरि-भूरि प्रशंसा की है।"

 

इनमें से कुछ विद्वानों के उदाहरण इस विषय में स्वत: ही विपुल प्रमाण प्रस्तुत करेंगे।

 

प्रो. जी.पी. हाल्स्टेंड अपनी पुस्तक "गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं" के पृष्ठ २० पर कहते हैं, "शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा सकती है।" "कुछ नहीं" को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन्‌ एक शक्ति देना हिन्दू जाति का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमो की शक्ति देने के समान है। अन्य कोई भी एक गणितीय आविष्कार बुद्धिमत्ता तथा शक्ति के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ।

 

इसी संदर्भ में बी.बी.दत्त अपने प्रबंध "संख्याआें को व्यक्त करने की आधुनिक विधि (इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली, अंक ३, पृष्ठ ५३०-४५०) में कहते हैं "हिन्दुआें ने दाशमलविक पद्धति बहुत पहले अपना ली थी। किसी भी अन्य देश की गणितीय अंकों की भाषा प्राचीन भारत के समान वैज्ञानिक तथा पूर्णता को नहीं प्राप्त कर सकी थी। उन्हें किसी भी संख्या को केवल दस बिंबों की सहायता से सरलता से तथा सुन्दरतापूर्वक व्यक्त करने में सफलता मिली। हिन्दू संख्या अंकन पद्धति की इसी सुन्दरता ने विश्व के सभ्य समाज को आकर्षित किया तथा उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया।"

 

इसी संदर्भ में प्रो. गिन्सबर्ग "न्यू लाइट ऑन अवर न्यूमरल्स" लेख, जो बुलेटिन आफ दि अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसायटी में छपा, के पृष्ठ ३६६-३६९ में कहते हैं, "लगभग ७७० ई, सदी में उज्जैन के हिन्दू विद्वान कंक को बगदाद के प्रसिद्ध दरबार में अब्बा सईद खलीफा अल मन्सूर ने आमंत्रित किया। इस तरह हिन्दू अंकन पद्धति अरब पहुंची। कंक ने हिन्दू ज्योतिष विज्ञान तथा गणित अरबी विद्वानों को पढ़ाई। कंक की सहायता से उन्होंने ब्रह्मपुत्र के "ब्रह्म स्फूट सिद्धान्त" का अरबी में अनुवाद किया। ्फ्रांसीसी विद्वान एम.एफ.नाऊ की ताजी खोज यह प्रमाणित करती है कि सातवीं सदी के मध्य में सीरिया में भारतीय अंक ज्ञात थे तथा उनकी सराहना की जाती थी।"

 

बी.बी. दत्त अपने लेख में आगे कहते हैं "अरब से मिश्र तथा उत्तरी अरब होते हुए ये अंक धीरे-धीरे पश्चिम में पहुंचे तथा ग्यारहवीं सदी में पूर्ण रूप से यूरोप पहुंच गए। यूरोपियों ने उन्हें अरबी अंक कहा, क्योंकि उन्हें अरब से मिले। किन्तु स्वयं अरबों ने एकमत से उन्हें हिन्दू अंक (अल-अरकान-अलहिन्द) कहा"।

 

गणित शास्त्र-२ : जब विश्व १०,००० जानता था, तब भारत ने अनंत खोजा

 

लेखक -सुरेश सोनी

 

संस्कृत का एकं हिन्दी में एक हुआ, अरबी व ग्रीक में बदल कर ‘वन‘ हुआ। शून्य अरबी में सिफर हुआ, ग्रीक में जीफर और अंग्रेजी में जीरो हो गया। इस प्रकार भारतीय अंक दुनिया में छाये।

 

अंक गणित- अंकों का क्रम से विवेचन यजुर्वेद में मिलता है - सविता प्रथमेऽहन्नग्नि र्द्वितीये वायुस्तृतीयऽआदिचतुर्थे चन्द्रमा: पञ्चमऽऋतु:षष्ठे मरूत: सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे। मित्रो नवमे वरुणो दशमंऽइन्द्र एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे। (यजुर्वेद-३९-६)। इसमें विशेषता है अंक एक से बारह तक क्रम से दिए हैं।

 

गणना की दृष्टि से प्राचीन ग्रीकों को ज्ञात सबसे बड़ी संख्या मीरीयड थी, जिसका माप १०४ यानी १०,००० था। और रोमनों को ज्ञात सबसे बड़ी संख्या मिली थी, जिसकी माप १०३ यानी १००० थी। जबकि भारतवर्ष में कई प्रकार की गणनाएं प्रचलित थीं। गणना की ये पद्धतियां स्वतंत्र थीं तथा वैदिक, जैन, बौद्ध ग्रंथों में वर्णित इन पद्धतियों के कुछ अंकों में नाम की समानता थी परन्तु उनकी संख्या राशि में अन्तर आता था।

 

प्रथम दशगुणोत्तर संख्या- अर्थात्‌ बाद वाली संख्या पहले से दस गुना अधिक। इस संदर्भ में यजुर्वेद संहिता के १७वें अध्याय के दूसरे मंत्र में उल्लेख आता है। जिसका क्रम निम्नानुसार है- एक, दस, शत, सहस्र, अयुक्त, नियुक्त, प्रयुक्त, अर्बुद्ध, न्यर्बुद्र, समुद्र, मध्य, अन्त और परार्ध। इस प्रकार परार्ध का मान हुआ १०१२ यानी दस खरब।

 

द्वितीय शतगुणोत्तर संख्या-अर्थात्‌ बाद वाली संख्या पहले वाली संख्या से सौ गुना अधिक। इस संदर्भ में ईसा पूर्व पहली शताब्दी के ‘ललित विस्तर‘ नामक बौद्ध ग्रंथ में गणितज्ञ अर्जुन और बोधिसत्व का वार्तालाप है, जिसमें वह पूछता है कि एक कोटि के बाद की संख्या कौन-सी है? इसके उत्तर में बोधिसत्व कोटि यानी १०७ के आगे की शतगुणोत्तर संख्या का वर्णन करते हैं।

 

१०० कोटि, अयुत, नियुत, कंकर, विवर, क्षोम्य, निवाह, उत्संग, बहुल, नागबल, तितिलम्ब, व्यवस्थान प्रज्ञप्ति, हेतुशील, करहू, हेत्विन्द्रिय, समाप्तलम्भ, गणनागति, निखध, मुद्राबाल, सर्वबल, विषज्ञागति, सर्वज्ञ, विभुतंगमा, और तल्लक्षणा। अर्थात्‌ तल्लक्षणा का मान है १०५३ यानी एक के ऊपर ५३ शून्य के बराबर का अंक।

 

तृतीय कोटि गुणोत्तर संख्या-कात्यायन के पाली व्याकरण के सूत्र ५१, ५२ में कोटि गुणोत्तर संख्या का उल्लेख है। अर्थात्‌ बाद वाली संख्या पहले वाली संख्या से करोड़ गुना अधिक।

 

इस संदर्भ में जैन ग्रंथ ‘अनुयोगद्वार‘ में वर्णन आता है। यह संख्या निम्न प्रकार है-कोटि-कोटि, पकोटी, कोट्यपकोटि, नहुत, निन्नहुत, अक्खोभिनि, बिन्दु, अब्बुद, निरष्बुद, अहह, अबब, अतत, सोगन्धिक, उप्पल कुमुद, पुण्डरीक, पदुम, कथान, महाकथान और असंख्येय। असंख्येय का मान है १०१४० यानी एक के ऊपर १४० शून्य वाली संख्या।

 

उपर्युक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में अंक विद्या कितनी विकसित थी, जबकि विश्व १०,००० से अधिक संख्या नहीं जानता था।

 

उपर्युक्त संदर्भ विभूति भूषण दत्त और अवधेश नारायण सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिन्दू गणित शास्त्र का इतिहास‘ में विस्तार के साथ दिए गए हैं।

 

आगे चलकर देश में आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, श्रीधर आदि अनेक गणितज्ञ हुए। उनमें भास्कराचार्य ने ११५० ई. में ‘सिद्धान्त शिरोमणि‘ नामक ग्रंथ लिखा। इस महान ग्रंथ के चार भाग हैं। (१) लीलावती (२) बीज गणित (३) गोलाध्याय (४) ग्रह गणित।

 

श्री गुणाकर मुले अपनी पुस्तक ‘भास्कराचार्य‘ में लिखते हैं कि भास्कराचार्य ने गणित के मूल आठ कार्य माने हैं-

 

(१) संकलन (जोड़) (२) व्यवकलन (घटाना) (३) गुणन (गुणा करना) (४) भाग (भाग करना) (५) वर्ग (वर्ग करना) (६) वर्ग मूल (वर्ग मूल निकालना) (७) घन (घन करना) (८) घन मूल (घन मूल निकालना)। ये सभी गणितीय क्रियाएं हजारों वर्षों से देश में प्रचलित रहीं। लेकिन भास्कराचार्य लीलावती को एक अदभुत बात बताते हैं कि ‘इन सभी परिक्रमों के मूल में दो ही मूल परिकर्म हैं- वृद्धि और हृ◌ास।‘ जोड़ वृद्धि है, घटाना हृ◌ास है। इन्हीं दो मूल क्रियाओं में संपूर्ण गणित शास्त्र व्याप्त है।‘

 

आजकल कम्प्यूटर द्वारा बड़ी से बड़ी और कठिन गणनाओं का उत्तर थोड़े से समय में मिल जाता है। इसमें सारी गणना वृद्धि और ह्रास के दो चिन्ह (अ,-) द्वारा होती है। इन्हें विद्युत संकेतों में बदल दिया जाता है। फिर सीधा प्रवाह जोड़ने के लिए, उल्टा प्रवाह घटाने के लिए। इसके द्वारा विद्युत गति से गणना होती है।

 

आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है। पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है, इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें-

 

‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई। अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?‘ उत्तर-१२० कमल के फूल।

 

वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले, लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘

 

‘मूल‘ शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात्‌ वर्ग एक भुजा‘। इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।

 

इसी प्रकार भास्कराचार्य त्रैराशिक का भी उल्लेख करते हैं। इसमें तीन राशियों का समावेश रहता है। अत: इसे त्रैराशिक कहते हैं। जैसे यदि प्र (प्रमाण) में फ (फल) मिलता है तो इ (इच्छा) में क्या मिलेगा?

 

त्रैराशिक प्रश्नों में फल राशि को इच्छा राशि से गुणा करना चाहिए और प्राप्त गुणनफल को प्रमाण राशि से भाग देना चाहिए। इस प्रकार भाग करने से जो परिणाम मिलेगा वही इच्छा फल है। आज से दो हजार वर्ष पूर्व त्रैराशिक नियम का भारत में आविष्कार हुआ। अरब देशों में यह नियम आठवीं शताब्दी में पहुंचा। अरबी गणितज्ञों ने त्रैराशिक को ‘फी राशिकात अल्‌-हिन्द‘ नाम दिया। बाद में यह यूरोप में फैला जहां इसे गोल्डन रूल की उपाधि दी गई। प्राचीन गणितज्ञों को न केवल त्रैराशिक अपितु पंचराशिक, सप्तराशिक व नवराशिक तक का ज्ञान था।

 

बीज गणित-बीज गणित की उत्पत्ति का केन्द्र भी भारत ही रहा है। इसे अव्यक्त गणित या बीज गणित कहा जाता था। अरबी विद्वान मूसा अल खवारिज्मी ने नौं◌ैवी सदी में भारत आकर यह विद्या सीखी और एक पुस्तक ‘अलीजेब ओयल मुकाबिला‘ लिखी। वहां से यह ज्ञान यूरोप पहुंचा।

 

भारत वर्ष में पूर्व काल में आपस्तम्ब, बोधायन, कात्यायन तथा बाद में व्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य आदि गणितज्ञों ने इस पर काम किया। भास्कराचार्य कहते हैं, बीज गणित- का अर्थ है अव्यक्त गणित, इस अव्यक्त बीज का आदिकारण होता है, व्यक्त। इसलिए सबसे पहले ‘लीलावती‘ में इस व्यक्त गणित अंकगणित का चर्चा की। बीजगणित में भास्कराचार्य शून्य और अनंत की चर्चा करते हैं।

वधा दौ वियत्‌ खं खेनधाते,

 

खहारो भवेत्‌ खेन भक्तश्च राशि:।

 

अर्थात्‌ यदि शून्य में किसी संख्या का भाग गिया जाए या शून्य को किसी संख्या से गुणा किया जाए तो फल शून्य ही आता है। यदि किसी संख्या में शून्य का भाग दिया जाए, तो परिण ख हर (अनन्त) आता है।

 

शून्य और अनंत गणित के दो अनमोल रत्न हैं। रत्न के बिना जीवन चल सकता है, परन्तु शून्य और अनंत के बिना गणित कुछ भी नहीं।

 

शून्य और अनंत भौतिक जगत में जिनका कहीं भी नाम निशान नहीं, और जो केवल मनुष्य के मस्तिष्क की उपज है, फिर भी वे गणित और विज्ञान के माध्यम से विश्व के कठिन से कठिन रहस्यों को स्पष्ट करते हैं।

 

व्रह्मगुप्त ने विभिन्न ‘समीकरण‘ खोज निकाले। इन्हें व्रह्मगुप्त ने एक वर्ण, अनेक वर्ण, मध्यमाहरण और मापित नाम दिए। एक वर्ण समीकरण में अज्ञात राशि एक तथा अनेक वर्ण में अज्ञात राशि एक से अधिक होती थी।

 

रेखा गणित-रेखा गणित की जन्मस्थली भी भारत ही रहा है। प्राचीन काल से यज्ञों के लिए वेदियां बनती थीं। इनका आधार ज्यामिति या रेखागणित रहता था। पूर्व में बोधायन एवं आपस्तम्ब ने ईसा से ८०० वर्ष पूर्व अपने शुल्ब सूत्रों में वैदिक यज्ञ हेतु विविध वेदियों के निर्माण हेतु आवश्यक स्थापत्यमान दिए हैं।

 

किसी त्रिकोण के बराबर वर्ग खींचना, ऐसा वर्ग खींचना जो किसी वर्ग का द्विगुण, त्रिगुण अथवा एक तृतीयांश हो। ऐसा वृत्त बनाना, जिसका क्षेत्र उपस्थित वर्ग के क्षेत्र के बराबर हो। उपर्युक्त विधियां शुल्ब सूत्र में बताई गई हैं।

 

किसी त्रिकोण का क्षेत्रफल उसकी भुजाओं से जानने की रीति चौथी शताब्दी के ‘सूर्य सिद्धान्त‘ ग्रंथ में बताई गई है। इसका ज्ञान यूरोप को क्लोबियस द्वारा सोलहवीं शताब्दी में हुआ। (क्रमश :)

 

गणित शास्त्र-३ : पाइथागोरस से पहले आर्यभट्ट, न्यूटन से पहले भास्कराचार्य

 

 

लेखक - सुरेश सोनी

 

हमारे यहां धनुष की चाप को ज्या कहते हैं। रेखागणित में इस शब्द का प्रयोग हमारे यहां ही हुआ। यहां से जब यह अरबस्तान में गया, तो वहां ई,ऊ आदि स्वर अक्षर नहीं हैं, अत: उन्होंने इसे ज-ब के रूप में लिखा। यह जब यूरोप पहुंचा तो वे जेब कहने लगे। जेब का अर्थ वहां छाती होता है। लैटिन में छाती के लिए सिनुस शब्द है। अत: इसका संक्षिप्त रूप हुआ साइन। ऐसे अनेक शब्दों ने भारत से यूरोप तक की यात्रा अरबस्तान होकर की है। इसे कहते हैं एक शब्द की विश्व यात्रा।

 

पाइथागोरस प्रमेय या बोधायन प्रमेय

 

कल्पसूत्र ग्रंथों के अनेक अध्यायों में एक अध्याय शुल्ब सूत्रों का होता है। वेदी नापने की रस्सी को रज्जू अथवा शुल्ब कहते हैं। इस प्रकार ज्यामिति को शुल्ब या रज्जू गणित कहा जाता था। अत: ज्यामिति का विषय शुल्ब सूत्रों के अन्तर्गत आता था। उनमें बोधायन ऋषि का बोधायन प्रमेय निम्न है-

 

दीर्घचतुरस स्याक्ष्णया रज्जू:

पार्श्वमानी तिर्यक्मानी

यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं

करोति। (बोधायन शुलब सूत्र १-१२)

 

इसका अर्थ है, किसी आयात का कर्ण क्षेत्रफल में उतना ही होता है, जितना कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई होती है। बोधायन ने शुल्ब-सूत्र में यह सिद्धान्त दिया गया है। इसको पढ़ते ही तुरंत समझ में आता है कि यदि किसी आयत का कर्ण ब स, लम्बाई अ ब तथा चौड़ाई अ स है तो बोधायन का प्रमेय ब स२ उ अ ब२ अ अ स२ बनता है। इस प्रमेय को आजकल के विद्यार्थियों को पाइथागोरस प्रमेय नाम से पढ़ाया जाता है, जबकि यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस से कम से कम एक हजार साल पहले बोधायन ने इस प्रमेय का वर्णन किया है। यह भी हो सकता है कि पाइथागोरस ने शुल्ब-सूत्र का अध्ययन करने के पश्चात अपनी पुस्तक में यह प्रमेय दिया हो। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि ज्यामिति के क्षेत्र में भारतीय गणितज्ञ आधुनिक गणितज्ञों से भी आगे थे। बोधायन ने उक्त प्रसिद्ध प्रमेय के अतिरिक्त कुछ और प्रमेय भी दिए हैं- किसी आयत का कर्ण आयत का समद्विभाजन करता है आयत के दो कर्ण एक दूसरे का समद्विभाजन करते हैं। समचतुर्भुज के कर्ण एक दूसरे को समकोण पर विभाजित करते हैं आदि। बोधायन और आपस्तम्ब दोनों ने ही किसी वर्ग के कर्ण और उसकी भुजा का अनुपात बताया है, जो एकदम सही है।

 

शुल्ब-सूत्र में किसी त्रिकोण के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाना, वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर का वृत्त बनाना, वर्ग के दोगुने, तीन गुने या एक तिहाई क्षेत्रफल के समान क्षेत्रफल का वृत्त बनाना आदि विधियां बताई गई हैं। भास्कराचार्य की ‘लीलावती‘ में यह बताया गया है कि किसी वृत्त में बने समचतुर्भुज, पंचभुज, षड्भुज, अष्टभुज आदि की एक भुजा उस वृत्त के व्यास के एक निश्चित अनुपात में होती है।

 

आर्यभट्ट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र भी दिया है। यह सूत्र इस प्रकार है-

 

त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्धासंवर्ग:।

 

त्रिभुज का क्षेत्रफल उसके लम्ब तथा लम्ब के आधार वाली भुजा के आधे के गुणनफल के बराबर होता है। साथ दिए चित्र के अनुसार अबस उ१/२ अ ब न्‌ स प। पाई ( ) का मान- आज से १५०० वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने का मान निकाला था।

 

किसी वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के (घेरे के) प्रमाण को आजकल पाई कहा जाता है। पहले इसके लिए माप १० (दस का वर्ग मूल) ऐसा अंदाजा लगाया गया। एक संख्या को उसी से गुणा करने पर आने वाले गुणनफल की प्रथम संख्या वर्गमूल बनती है। जैसे- २न्२ उ ४ अत: २ ही ४ का वर्ग मूल है। लेकिन १० का सही मूल्य बताना यद्यपि कठिन है, पर हिसाब की दृष्टि से अति निकट का मूल्य जान लेना जरूरी था। इसे आर्यभट्ट ऐसे कहते हैं-

 

चतुरधिकम्‌ शतमष्टगुणम्‌ द्वाषष्ठिस्तथा सहस्राणाम्‌

अयुतद्वयनिष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाह:॥

 

(आर्य भट्टीय-१०)

 

अर्थात्‌ एक वृत्त का व्यास यदि २०००० हो, तो उसकी परिधि ६२२३२ होगी।

 

परिधि - ६२८३२

व्यास - २००००

 

आर्यभट्ट इस मान को एकदम शुद्ध नहीं परन्तु आसन्न यानी निकट है, ऐसा कहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि वे सत्य के कितने आग्रही थे।

 

अकबर के दरबार में मंत्री अबुल फजल ने अपने समय की घटनाओं को ‘आईने अकबरी‘ में लिखा है। वे लिखते हैं कि यूनानियों को हिन्दुओं द्वारा पता लगाये गए वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के मध्य सम्बंध के रहस्य की जानकारी नहीं थी। इस बारे में ठोस परिज्ञान प्राप्त करने वाले हिन्दू ही थे। आर्यभट्ट को ही पाई का मूल्य बताने वाला प्रथम व्यक्ति बताया गया है।

 

त्रिकोणमिति (कैल्कुलस)

 

त्रिकोणमति का आधार बोधायन का प्रमेय है। अत: स्वाभाविक रूप से ही त्रिकोणमिति के सिद्धांत भी शुल्ब सूत्रों में दिए गए हैं। भारत के ज्या और कोटिज्या पश्चिम में जाकर साइन और कोसाइन हो गए। वास्तव में ज्या शब्द धनुष की डोरी से आया। आगे के चित्र में ख ग आधे धनुष के जैसा है तथा ग प उसकी डोरी (ज्या) जैसा है। क प को कोटिज्या कहा गया है। वृत्त में अर्द्धव्यास से ज्या (ग प) तथा कोटिज्या (क प) का मान निकालने की पद्धति भारत के गणितज्ञों को ज्ञात थी। यदि कोण ग क प को थ माना जाए, तो आर्यभट्ट (प्रथम) ने कोण थ के हिसाब से ज्या और कोटिज्या का मान निकाला। आर्यभट्ट ने ग प का मान त्रिज्या (क ग) न्‌ ज्या थ तथा ग च (क प) का मान त्रिज्या (क ग) न्‌ कोटिज्या थ बताया। आज की त्रिकोणमिति के अनुसार इन्हें इस प्रकार लिखा जा सकता है-

 

आर्यभट्ट ने शून्य से ९०० के कोणों के बीच विभिन्न कोणों के लिए ज्या (साइन) के मान निकाल कर उसकी सारिणी भी दी है। भास्कराचार्य की ‘लीलावती‘ में एक रोचक प्रश्न दिया हुआ है- दो बंदर सौ हाथ (एक हाथ उ २० इंच) ऊंचे पेड़ (च छ) पर बैठे हैं। पेड़ की जड़ से दो सौ हाथ दूर एक कुआं (झ) है। एक बंदर पेड़ (०) से उतर कर कुएं तक जाता है।

 

दूसरा बंदर एक निश्चित ऊंचाई (ज) तक एकदम सीधे ऊपर उछल कर सीधे कुएं तक छलांग लगाता है। यदि दोनों बन्दरों की तय की हुई दूरी समान है (छ च अ च झ उ छ ज अ ज झ) तो दूसरा बन्दर कितना ऊपर उछला अर्थात्‌ छ ज कितना है? यह प्रश्न निश्चित रूप से त्रिकोणमिति का है और इसी से छज की दूरी ५० हाथ आती है। स्पष्ट है कि भास्कराचार्य ने त्रिकोणमिति के सभी सिद्धान्तों (सूत्रों) का वर्णन लीलावती में किया है।

 

भास्कराचार्य की ही पुस्तक ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ के चौथे खण्ड ग्रह-गणित में किसी ग्रह की तात्क्षणिक गति निकालने के लिए अवकलन (डिफरेन्शिएशन) का प्रयोग किया गया है। यह गणित (कैलकुलस) आधुनिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का आधार है। लाईबटेनिज तथा न्यूटन इसके आविष्कारकर्ता माने जाते हैं। इन दोनों से पांच सौ वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने कैल्कुलस का प्रयोग ग्रहों की गति निकालने के लिए किया था। इस प्रकार गणित के क्षेत्र में प्राचीन भारत की श्रेष्ठता का हमें ज्ञान होता है।

 

वैदिक गणित :- पुरी के शंकराचार्य भारती कृष्णतीर्थ जी ने ८ वर्ष की साधना से एक नवीन गणितीय पद्धति खोजी, जिसे उन्होंने बिना आंसू का गणित कहा, जो शुष्क, उदास और सतानेवाला नहीं अपितु सरल तथा आनंद देने वाला हो जाता है। अपनी इस पद्धति को उन्होंने वैदिक गणित कहा तथा कहा कि इसका आधार वेद हैं।

 

उन्होंने १६ मुख्यसूत्र तथा १३ उपसूत्र दिए जिनका अभ्यास करने पर दस प्रकार का गणित-अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, गोलीय त्रिकोणमिति, घन ज्यामिती, समाकल, अवकल तथा कलन इत्यादि सभी प्रकार के प्रश्न चुटकी में हल किए जा सकते हैं। यहां उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद मात्र संहिता नहीं है वेद अर्थात्‌ समस्त ज्ञान का स्रोत और असीमित कोष है। इस व्यापक परिधि में वैदिक गणित नाम के सूत्र आते हैं। यद्यपि सूत्र वर्तमान संहिता ग्रंथों में इसी रूप में नहीं मिलते।

 

इन सूत्रों का अभ्यास होने और इन्हें लागू करने का तरीका जानने पर आश्चर्यजनक परिणाम आते हैं। जगद्गुरु जी ने स्वयं देश के कुछ विश्वविद्यालयों में इसका प्रदर्शन किया। अमरीका में गणित के प्राध्यापकों के बीच जब इसका प्रदर्शन किया और एक जटिल सवाल जो ३-४ पृष्ठों में सिद्ध हो सकता था, उसे पूछते ही उत्तर बोर्ड पर लिखा, तो सभी श्रोता अचंभित हो गए। इंग्लैण्ड के प्रोफेसर निकोलस इसे गणित नहीं जादू कहते हैं। जगद्गुरु भारती कृष्णतीर्थ जी से लोग पूछते थे, ये गणित है या जादू तो वे उत्तर देते हैं कि आप जब तक नहीं जानते तब तक जादू है और जब जान लेते हैं तो गणित।

 

यह पद्धति यदि प्रारंभ से ही सिखाई जाए तो देश में गणित के अभ्यास में रुचि बढ़ सकती है। अनेक विद्वान आज इस पर शोध कर रहे हैं तथा उसे सीखने की पद्धतियां विकसित कर रहे हैं। वे अद्भुत गणितीय १६ सूत्र तथा १३ उपसूत्र व उनके अर्थ विस्तार से अगले अंग में। 

(क्रमश:)

उपश्रेणियाँ

अवर्गीकृत

ऋषिः अर्थात् ऋषति पश्यति इति। ‘ऋषि' इत्येतस्य पदस्य व्युत्पत्तिलभ्यः अर्थ एव मन्त्रद्रष्टा इत्यस्ति। एष 'ऋषि'-शब्द इगुपधात् कित् इत्यनेनौणादिकेन सूत्रेण इनि कृते निष्पद्यते । निरुक्ते च विद्यमानात् ‘तद्येनास्तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भ्वभ्यानर्षत्...॥ इत्यादिकाः पङ्क्तयः ऋषेर्मन्त्रद्रष्टृत्वमुपपादयन्ति । अत ऋषयः मन्त्राणां द्रष्टार: सन्ति न च कत्तारः। वैदिकवाङ्गमये सप्तर्षयः प्रसिद्धाः सन्ति।

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः ।

जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ॥


दकाराः ऋषयः इत्युक्ते मन्त्राणां पदकाराः ऋषयः, ये वेदार्थावबोद्धुं प्रतिमन्त्रस्य अवान्तर्भूतपदानां पृथक्करणं कृत्वा तत्तत् संहितानां पदपाठं निर्मितवन्तः । अनेन पदपाठेन मन्त्राणाम् अर्थस्य अतिसुलभतया अवबोधो भवति । एतेषां पदपाठानां कर्तारः बहवः ऋषयः अभूवन्। शाकल्यः ऋग्वेदस्य पदपाठं प्रस्तुतवान् । अथर्ववेदस्य पदपाठस्तु ऋग्वेदस्य पदपाठानुरूपेणैव अस्ति। किञ्च अस्य रचनाकर्त्तुः नाम अद्यावधि अज्ञातम् एवाऽस्ति। यजुर्वेदस्य तैत्तिरीयसंहितायाः पदपाठकारस्य नाम अात्रेयोऽस्ति। गाग्र्यः सामवेदस्य पदकारः अस्ति।

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